हिसार। मिलगेट क्षेत्र में एक मिष्ठान भंडार पर कार्रवाई को नगर निगम के अफसर जिस तरीके से पसीना बहाते दिखे थे, इससे पूर्व अवैध बिल्डिंगों के निर्माण को रोकने के लिए शहर ने ऐसा नजारा नहीं देखा। इसलिए शहर में आम चर्चा है कि अाखिर निगम अफसरों को अवैध इमारतें बनने के बाद ही क्यों नजर आती हैं। यदि अवैध निर्माण कराने वालों पर गाज गिरती है, लेकिन जिम्मेदारों पर दरियादिली क्यों। शहर में जनता के बीच जाकर जब इन सवालों को पूछा गया तो जनता ने ऐसे सवाल किए।
मेयर ने लिए होते कड़े फैसले तो हालात होते दूसरे
जनता पर निगम अफसर ठीकरा फोड़ देते हैं कि सहयोग नहीं मिल रहा। आखिर करोड़ों की बिल्डिंग बनाने वालों को अवैध निर्माण के रास्ते किसने बताए और बचाव कैसे होगा यह किसने बताया यह बड़ा सवाल है। ऐसे में यदि मेयर शकुंतला राजलीवाला ने अवैध निर्माण को रोकने के लिए उपायुक्त की तर्ज पर कड़े फैसले शुरुआत में लिए होते तो हालात ऐसे नहीं होते।
ईओ, सेक्रेटरी, एक्सईएन की आपस में नहीं बन पाई सहमति
बात नौ माह पूर्व की करें या फिर छह और चंद दिनों पूर्व तक की। ईओ से लेकर सेक्रेटरी, एक्सईएन और एमई तक के आपस में छत्तीस के आंकड़े भी कई बार कार्रवाई में बाधा बने। क्योंकि जब भी कार्रवाई या फिर ठोस निर्णय लेने का मामला सामने आया तभी कई बार इनकी आपसी लड़ाई कार्रवाई में व्यवधान डालती रही। फिलहाल ईओ और सेक्रेटरी नए हैं। इनका आंकड़ा तो फिलहाल उपायुक्त डा़ॅ. चंद्रशेखर खरे ने फिट बैठा दिया है।
बिल्डिंग ब्रांच कर्मचारियों की कमी का बस रोना
अवैध निर्माण के दौरान सबसे अधिक सवाल बिल्डिंग ब्रांच के अफसरों और कर्मचारियों की कार्यशैली पर उछलते हैं। जबकि इस ब्रांच के अफसर और कर्मचारी बस मुलाजिमों की कमी बताकर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जैसे बिल्डिंग सीलिंग और बिल्डिंगों को तोड़ने के लिए अमला जुटाया जाता है, उससे पूर्व क्यों नहीं सक्रियता रहती।
पांच सवालों के जवाब नहीं निगम के पास
अभी तक निगम ने कितनी अवैध बिल्डिंगों को नोटिए दिए, रिकाॅर्ड कहां हैं।
{अवैध निर्माण हो रहे थे, उस दौरान निगम ने बिल्डिंग स्वामियों पर क्या कार्रवाई की।
{गड़बड़ी करने वाले अफसरों, कर्मचारियों पर कार्रवाई करने से गुरेज क्यों किया गया।
{प्रशासनिक अफसरों को कार्रवाई के नाम नगर निगम अफसर गुमराह क्यों करते रहे।
{नगर निगम ने अवैध निर्माण रोकने तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए।
नगर पार्षद भी करते हैं वोट बैंक की राजनीति
पार्षदों की भूमिका भी वोट बैंक की राजनीति तक सिमट गई है। जिस वक्त उनके वार्ड में कोई अवैध निर्माण होता है तो वह सीधे उपायुक्त को क्यों नहीं सूचित करते। पार्षदों से जुड़े तमाम लोग बताते हैं कि जिन्होंने चुनाव के दौरान वोट दिए उनके अवैध कब्जे और अतिक्रमण बर्दाश्त हैं, लेकिन जिन्होंने वोट नहीं दिए यानि विरोधी खेमे के कब्जों की शिकायत ही निगम तक पहुंचाते हैं।
बिल्डिंग सब कमेटियों की सिफारिश डस्टबिन में क्यों
शहर में अवैध निर्माण और अतिक्रमण को रोकने के लिए बिल्डिंग सब कमेटी की भूमिका भी धरातल पर नहीं उतर सकी है। सब कमेटी ने अवैध निर्माण रोकने के लिए सफाई दरोगाओं से निगरानी कराने से लेकर अवैध निर्माण करने वालों को नोटिस दिए जाने और नक्शा कैसिंल किए जाने की सिफारिस पर अमल नहीं हो सका।