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मैट ने भी डुबोई सेज की लुटिया

8 वर्ष पहले
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चंडीगढ़. एक तो मंदी के कारण पहले ही स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) विकसित नहीं हो पा रहे थे। रही-सही कसर मीनिमम अल्ट्रनेटिव टैक्स (मैट) ने पूरी कर दी। २क्१क्-११ के केंद्रीय बजट में सेज के मुनाफे पर १८.5 फीसदी के आसपास मैट लगाने का प्रावधान किया गया। यह टैक्स २क्११-१२ से शुरू होना था। हालांकि उद्योगपतियों ने इसका कड़ा विरोध किया लेकिन टैक्स वापस नहीं लिया गया। इसके चलते उद्योगपतियों ने सेज से हाथ खींच लिए।
सेज में नहीं लगना था टैक्स : सेज की घोषणा करते समय केंद्र सरकार ने दावा किया था कि यहां उद्योगों को न केवल हर तरह के टैक्स से छूट मिलेगी बल्कि कई दूसरी तरह की रियायतें दी जाएंगी। मैट ने उद्योगपतियों को निराश कर दिया। इस टैक्स के बाद उद्योगपतियों का उत्साह कुछ कम होने की बात हरियाणा स्टेट इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट कॉपरेरेशन (एचएसआईआईडीसी) के पिं्रसिपल सेक्रेटरी वाइ.एस. मलिक भी मानते हैं।
आधा-अधूरा ढांचा, मार्केटिंग करने में रहे फेल
जानकारों का कहना है कि हम अपने सेज की मार्केटिंग बेहतर तरीके से नहीं कर पाए। सेज के लिए जमीन देने के अलावा ऐसा ढांचा नहीं बन पाया जिससे उद्योगपतियों को वहां आने के लिए आकर्षित किया जा सके। उद्योगपतियों को लुभाने के लिए भी खास नहीं हुआ। नतीजा, ऐसा माहौल ही नहीं बन पाया जिससे सेज विकसित हो सके। हालांकि वाइएस मलिक इससे सहमत नहीं हैं।
मंदी ने भी मारा
दुनिया में छाई मंदी भी सेज के विकसित न होने की बड़ी वजह बनकर उभरी है। एचएसआईआईडीसी के अफसरों के अनुसार, उद्योगपति ‘वेट एंड वॉच’ की स्थिति में थे क्योंकि मंदी में उद्योग खड़ा करना रिस्की था।
एक वजह- छोटा आकार
चीन जैसे देश में सेज बहुत बड़े हैं। कई-कई हजार एकड़ में फैले हुए। हरियाणा में रिलायंस और एक-दो कंपनियों को छोड़ दें तो किसी दूसरी कंपनी के पास बहुत ज्यादा जमीन नहीं थी।