ईश्वर जीव तो प्रकृति है अनादि
आर्यसमाज भवन सेक्टर-6 में आर्य केंद्रीय सभा करनाल के तत्वावधान में लगाए गए तीन दिवसीय योग प्रशिक्षण शिविर के तीसरे दिन के सत्र का शुभारंभ यज्ञो श्रैष्ठतम कर्म: की भावना से यज्ञ कार्य से हुआ। यज्ञ के ब्रह्मा प. शिव प्रसाद उपाध्याय ने वैदिक रीति से यज्ञ करवाया तथा यज्ञमानों को सुखी जीवन का आशीर्वाद दिया। मुख्य वक्ता स्वामी विवेकानंद जी महाराज ने योग चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ईश्वर, जीव तथा प्रकृति अनादि हैं। प्रकृति जड़ होने के कारण कम तथा उसके फल से दूर है। जीवात्मा ही कर्म करता है। कर्म बिना उद्देश्य के नहीं होता है।
सभीजीवात्माएं एक समान
एकव्यक्ति घर में बिस्तर बांध कर यों हि स्टेशन पर नहीं पहुंच जाता है। वह जाने का लक्ष्य निर्धारित करके घर से चलता है। ठीक वैसे ही जीवात्मा शरीर को धारण कर मोक्ष लक्ष्य की ओर बढ़ता है। स्वामी जी ने कहा कि सभी जीवात्माएं एक समान हैं। सब का लक्ष्य एक जैसा है और वह है मोक्ष। जैसे लौकिक संसार में पिता चाहता है कि उसकी संतान उच्च अधिकारी बने, बड़ा व्यापारी बने या महान विद्वान बने। इसी प्रकार परमपिता परमात्मा चाहता है कि उसकी संतानें आत्माएं मोक्ष प्राप्त कर आनंद भोगे। यदि यह संभव नहीं तो कम से कम महान पंडित तो बने ताकि अच्छे संस्कार बनते चले। स्वामी जी ने बताया कि मुक्ति के लिए विद्या अर्थात शुद्ध ज्ञान की जरूरत है। अत: वह जीवन में अविद्या का नाश और विद्या की प्राप्ति का प्रय| करें। जो विद्या उसने ग्रहण की है उस पर आचरण करे क्योंकि शाब्दिक ज्ञान से भी मुक्ति का लक्ष्य नहीं मिल पाता। जैसे रावण तथा दुर्योधन जैसे व्यक्ति शाब्दिक ज्ञान से तो युक्त थे,परंतु इस पर आचरण नहीं किया। अत: वे भटक गए। अविद्या तथा विद्या क्या है? यह समझाते हुए स्वामी जी ने कहा कि नित्य को अनित्य तथा अनित्य का नित्य समझना, पवित्र को अपवित्र, अपवित्र को पवित्र समझना, दुख को सुख तथा सुख को दुख समझना ही अविद्या है। इसके प्रतिकूल विद्या है।
संसार का भोग जीने की बजाय सुख के लिए करें
भोगविषय पर बोलते हुए स्वामी जी ने कहा कि यदि संसार का भोग जीने की बजाय सुख के लिए करेंगे तो हमें परिणाम ताप, संस्कार तथा गुण वृति विरोध दुखों का सामना करना पड़ेगा। आप खीर, रसगुल्ला इत्यादि तो खाएं पर मन में उसका सुख लें। मिल जाए तो खाएं अन्यथा कोई बात नहीं का भाव रखें। इस अवसर