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लवण ग्रस्त भूमि के लिए करें फलदार पौधे विकसित

7 वर्ष पहले
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केंद्रीयमृदा लवणता अनुसंधान संस्थान में भूमि एवं जल-सुधार एवं प्रबंधन की उन्नत प्रौद्योगिकियां विषय पर 10 दिवसीय पाठयक्रम शुरू किया गया। इस पाठ्यक्रम में हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना से आए 23 प्रक्षिणार्थियों ने भाग लिया।

इस पाठ्यक्रम का उद्घाटन डॉ. एसके चौधरी, सहायक महानिदेशक (मृदा एवं जल प्रबंधन) प्राकृतिक संसाधान प्रबंधन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली एवं अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डाॅ. दिनेश कुमार शर्मा द्वारा किया गया। डॉ. एसके चाैधरी ने कहा कि इस संस्थान ने लवणीय भूमि पानी में सुधार करके देश की खाद्यान्न सुरक्षा को मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक किसान को सॉयल हेल्थ कार्ड उपलब्ध करवाना अति आवश्यक है। उन्होंने जिप्सम के विकल्प पर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने लवणग्रस्त भूमियों के लिए सब्जियां तथा फलदार वृक्षों की प्रजातियां विकसित करने पर भी जोर दिया।

सोयाबीनकी महत्वता के बारे में विस्तार से बताया

उन्होंनेसोयाबीन को महत्वपूर्ण फसल बताते हुए कहा कि विभिन्न विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर सोयाबीन की लवण सहनशील प्रजातियां विकसित की जा सकती हैं। उन्होंने निम्न गुणवत्ता वाले पानी के सुधार के लिए अतिरिक्त केन्द्रों की स्थापना के बारे में बताया। उन्होंने बायो टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी, गुणवत्ता वाला सिंचित जल, मौलिकूूलर बायोलॉजी, कृषि वानिकी इत्यादि पर भी जोर दिया। इससे पहले वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. अजय कुमार भारद्वाज ने इस पाठ्यक्रम की रूपरेखा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस पाठ्यक्रम में लवणीय क्षारीय भूमियों तथा निम्न गुणवत्ता वाले पानी के सुधार संबंधित जानकारी दी जाएगी। उन्होंने कहा कि भूमि एवं जल-सुधार के लिए विशेष कदम उठाए जाएंगे।

भूमि सुधार में किसानों की भूमिका अविस्मरणीय

इससंस्थान ने जिप्सम द्वारा क्षारीय भूमि तथा उप सतही निकास प्रणाली द्वारा लवणीय भूमि को सुधारने में तथा धान, गेहूं एवं सरसों की लवण सहनशील प्रजातियों को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने यह भी कहा कि संस्थान द्वारा 2.0 मिलियन हेक्टेयर लवणीय भूमि को सुधारने में किसानों की भागीदारी को भुलाया नहीं जा सकता जिससे लगभग 16 मिलियन टन प्रतिवर्ष अतिरिक्त खाद्यान्न उत्पन्न हो रहा है। मंच संचालन डा. गजेन्द्र यादव, वैज्ञानिक