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चार दोस्तों की सोच : अब प्रतिदिन मिलता है सैकड़ों लोगों को निवाला
हरभूखे को भरपेट भोजन, वो भी बिल्कुल नीयत समय पर। समाजसेवा को यह लंगर सिविल अस्पताल में पिछले 41 वर्षों से चल रहा है। लंगर की शुरुआत होने की कहानी 41 वर्ष पूर्व चार दोस्तों की सोच का परिणाम है, जिससे वर्तमान में सैंकड़ों लोगों को भरपेट भोजन मिल रहा है। ठंडी सड़क पर स्थित भगवान सत्संगी भवन में जाने वाले चार दोस्त एक दिन सत्संग के बाद होने वाले भजन को छोड़कर सिविल अस्पताल में घूमने चले गए।
चारों दोस्तों ने देखा कि कुछ मरीज तो दवाई के अभाव में ही दम तोड़ रहे हैं। 100 रुपए इकट्ठे किए। ये पैसे एक स्टाफ नर्स काे दिए उसे जरूरतमंदों को दवाई देने के लिए कहा गया। तीसरे दिन अस्पताल पहुंचे तो दवाई खत्म हो चुकी था। फिर से 100 रुपए एकत्रित किए, इस बार जरूरतमंदों को खुद अपने हाथ से दवाई बांटी। इसके बाद शहर में चंदा इकट्ठा करना शुरू किया गया। दवाई बांट रहे थे तो देखा कि कुछ लोग भोजन के लिए भी भटकते हैं। शहर से चंदा मिलना शुरू हुआ तो हौंसला बढ़ा, खाना बनाना भी शुरू कर दिया गया। हर वार्ड में जाकर पूछा जाता कि किसी को खाने की जरूरत तो नहीं? जरूरतमंद को बेड पर ही खाना पहुंचाते हैं। अस्पताल में ही 1976 में रेडक्रास की ओर से एक कमरा मिल गया। आज जन सेवा दल के नाम से रजिस्टर संस्था रोजाना सैंकड़ाें लोगों को खाना उपलब्ध कराती है।
आेपीडी के सामान्य मरीजों को भी पहुंचाते हैं भोजन
अस्पतालमें मरीज के साथ आए तीमारदारों के लिए भी वार्ड में ही खाना दिया जाता है। वहीं अस्पताल में टैस्ट करवाने के लिए दूर-दराज से आए मरीजों के लिए भी खाना उपलब्ध करवाया जाता है। इनके लिए संस्था के कार्यालय में प्रतिदिन 11 से 2 बजे तक खाना खिलाया जाता है।
ये बांटा जाता है खाना
सुबहके भाेजन में साढे 7 बजे स्पेशल चावल-पुलाव बांटा जाता है। 11 बजे मरीजों के लिए दलिया दाल-रोटी दी जाती है। वहां शाम के समय 5 बजे मूंग दाल की खिचड़ी सब्जी रोटी दी जाती है। फिर 6 बजे दूध दिया जाता है। संस्था संरक्षकों में एकमात्र जीवित सदस्य बताते हैं कि हर रोज करीब 300 लोगों के लिए खाना तैयार किया जाता है।
तीन दोस्तों का हो चुका है स्वर्गवास
संस्थाकी शुरुआत की कहानी बताते-बताते अचानक अमरनाथ की आंख भर आई। 83 साल के अमरनाथ ने बताया कि संस्था की कहानी लिखने वाले उसके तीन दोस्त अब दुनिया में नहीं हैं। बलदेव राज आनंद जो शुरुआत में 50 रुपए दान करने वाले थे कि मृत्यु 1978 में ही हो गई थी। वहीं आसानंद सर्राफ पंडित गिरधारी लाल शर्मा भी इस वक्त दुनिया में नहीं हैं।