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लवणीय-क्षारीय भूमि के कारण 6 मिलियन टन खाद्यान्न का हो रहा है नुकसान: शर्मा

5 वर्ष पहले
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सीएसएसआरआईके निदेशक डॉ. प्रबोध चंद्र शर्मा ने कहा कि इस संस्थान द्वारा 1969 से लवणीय क्षारीय मृदाओं के सुधार के लिए व्यापक स्तर पर तकनीकों का विकास किया गया। इस समय देश में लगभग 6.73 मिलियन हेक्टेयर लवणीय एवं क्षारीय भूमि के कारण प्रतिवर्ष देश को लगभग 6 मिलियन टन खाद्यान्न का नुकसान हो रहा है। संस्थान ने अपनी तकनीकों तथा लवण सहनशील प्रजातियों के विकास द्वारा लगभग 2 मिलियन हेक्टेयर भूमि का सुधार करने में सफलता प्राप्त की है। इस दिशा में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप द्वारा उद्योग क्षेत्र की कम्पनियों के सहयोग से इस दिशा में भी अधिक सफलतापूर्वक कार्य करने की संभावना है। वह राष्ट्रीय जल निकास स्टेक होल्डर की परामर्श मीटिंग के अवसर पर बोल रहे थे।

मुख्य अतिथि डाॅ. एके सिक्का, अध्यक्ष अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान, (भारत कार्यालय) तथा भूतपूर्व उपमहानिदेशक भा.कृ.अनु.प., नई दिल्ली ने कहा कि केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने जल निकास एवं प्रबंधन के लिए सक्रिय रूप से क्रियात्मक व्यवहारात्मक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जलनिकास प्रणाली बिछाने के लिए आवश्यक सामग्री की आवश्यकता होती है, वह सामग्री उद्योगों द्वारा बनाई जाती है। इसलिए इन उद्योगों का सक्रिय सहयोग भी लेना होगा। हरित क्रांति में सिंचाई, नहरी सिंचाई और जल निकास पद्धति ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हमें भू-जल निकास के लिए योजना, प्रारूप, लागू करना और कम लागत संबंधी दिशा-निर्देश नए सिरे से बनाने होंगे। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत इस समस्या को सुलझाने के प्रयास जारी किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस मीटिंग में जो भी सुझाव दिए जाएंगे।

इसमें देश में लवणीय क्षारीय मृदाओं में जल निकास की समस्याओं एवं समाधान विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। इस मीटिंग में देश के नहरी कमांड क्षेत्रों में जल प्रभावित लवणीय मृदाओं को बड़े पैमाने पर सुधारने हेतु जल निकास दिशा-निर्देशों को बनाना, भूजल निकास प्रणाली का मूल्य कम करना, बड़े स्तर पर जलनिकास प्रणाली बिछाना, कार्यात्मक नीतियों का निर्धारण करना, मृदा एवं जल प्रबंध, फसल प्रबंध इत्यादि विषयों पर मंथन किया गया। इस मीटिंग में देश के 13 राज्यों से सम्मिलित लगभग 60 वरिष्ठ अधिकारी, अभियंता, प्रोफेसर, वैज्ञानिकों ने देश की लवणग्रस्त क्षारीय मृदाओं में जल निकास की समस्याओं उनके समाधान के लिये अपने सुझाव दिए।

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