घर की दहलीज से हो बेटियों के प्रति सोच में बदलाव की शुरुआत
समाजके प्रत्येक व्यक्ति की दृष्टि में बेटा-बेटी दोनों में समानता का भाव होना आवश्यक है। यह भाव किसी सभा, सेमिनार भाषण से नहीं आएगा, बल्कि घर की दहलीज से ही इसकी शुरुआत होगी। जब तक प्रत्येक घर में माता-पिता अपने बच्चों को अच्छे संस्कार नहीं देंगे तब तक बेटियों के प्रति विभिन्न रूपों में अत्याचार, दुराचार अनाचार को पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया सकता। यह कहना है कानून, शिक्षा, स्वास्थ्य समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़े शहर के बुद्धिजीवियों का।
दैनिक भास्कर की ओर से ‘मेरी बेटी-मेरा गौरव’ अभियान के तहत रविवार को फोकस ग्रुप डिस्कशन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें बुद्धिजीवियों ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि इस बदलाव के साथ बेटियों को उच्च शिक्षित करने के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाना भी आवश्यक है। इस काम को समाज सरकार को मिल-जुलकर करना होगा। आधुनिक समाज में दहेज से बढ़कर बेटी की सुरक्षा एक बड़ी समस्या के रूप में उभरकर आई है, ये खत्म होनी चाहिए। इसके अलावा महिला-पुरुषों में समानता लाने के लिए बेटियों को हर क्षेत्र में 50 फीसदी भागीदारी मिलनी चाहिए। शासन प्रशासन को कानूनों को ईमानदारी से लागू करना चाहिए। ऐसा करके हम बेटियों को बराबरी पर ला सकेंगे, जिससे समाज में खुशहाली आएगी।
माइंड सेट करें और अच्छे संस्कार दें
समानता से होना चाहिए पालन
प्रतिमा सुरक्षा सम्मान समिति के अध्यक्षनरेंद्र अरोड़ा नेकहा कि लड़कियों के उत्थान को लेकर अब तक किए गए प्रयासों के रिजल्ट अच्छे रहे हैं। हम डेढ़ साल पीछे देखें तो महिलाआें की स्थिति बहुत खराब थी। समाज में बदलाव रहा है, लेकिन अभी ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव की जरूरत है। पढ़े-लिखे लोग इस बात को समझें, अपना माइंड सेट करें और बच्चों काे अच्छे संस्कार दें।
पर्यावरण संरक्षण समिति के अध्यक्ष एसडी अरोड़ा ने कहा कि पूरे देश के आंकड़े देखें तो हरियाणा में लिंगानुपात सबसे खराब है। हालांकि सामाजिक, सरकारी मीडिया के प्रयासों से लिंगानुपात में बढ़ोतरी हुई है। समाज में लड़के लड़कियों का पालन-पोषण बराबर होना चाहिए। दहेज पर अंकुश लगे। राजनीति प्रशासनिक इच्छा शक्ति से महिला सुरक्षा कानून लागू हों।
बच्चों में अनुशासन लाना होगा
रामचंदमेमोरियल अस्पताल के संचालकडॉ. कमल चराया नेकहा कि शिक्षा के द्वारा ही हम बेटियों को समाज में बराबरी का दर्जा दिला सकते हैं। निचले स्तर यानी गांवों से ही लड़कियों को शिक्षित बनाने का काम होना चाहिए, क्योंकि शिक्षित व्यक्ति बहुत सारी समस्याओं का समाधान खुद भी करने में सक्षम हो जाता है। जहां तक बेटियों के विकास और सुरक्षा की बात है तो समाज को अपने बच्चों में अनुशासन लाना होगा।
गलत दिशा में जा रही युवा पीढ़ी
प्रो.जोगेंद्र मदान नेकहा कि घर से स्कूल-कॉलेज रहे बच्चों की आजादी को चेक किया जाना जरूरी है, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी गलत दिशा में जा रही है। लड़के पढ़ नहीं रहे, लड़कियां भी सुविधाओं अधिकारों का दुरुपयोग करें। इसलिए प्रत्येक घर में बच्चों से जवाब तल्बी का प्राचीन तरीका अपनाया जाना चाहिए। युवाओं को उनकी योग्यता के अनुसार समय पर रोजगार मिलना चाहिए।
सर्विस में अधिक कोटा मिले
डॉ.वीके सहगल नेकहा कि समाज के उत्थान में लड़कियों का योगदान अहम है, क्योंकि उनमें सेवाभाव कर्तव्य भावना अधिक होती है। लड़कियों की शिक्षा के प्रॉपर प्रबंध होने चाहिए। उन्हें अधिक सुविधाएं मिलनी चाहिए। जहां तक सर्विस की बात है उन्हें अधिक कोटा मिलना चाहिए। हमें अपने हिंदुस्तान में ही सुरक्षित रहना है तो लड़कियों को ऊंचाइयों पर ले जाने के प्रयास करने होंगे।
बेटी किसी को बुरी नहीं लगती
महिलाथाना अध्यक्ष इंस्पेक्टर लक्ष्मी देवी नेकहा कि लड़कियों के प्रति सोच में बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। बेटी किसी को बुरी नहीं लगी, उसका आना भी बुरा नहीं लगता, लेकिन जब वह 12 साल से आगे बढ़ती है तो माता-पिता के मन में उनकी सुरक्षा को लेकर भय पैदा होता है। कानून अकेले कुछ नहीं कर सकता। बच्चों में अच्छे संस्कार अपनी नेचर में परिवर्तन लाना होगा।
मिले 50 प्रतिशत रिजर्वेशन
अधिवक्तापरिषद के अध्यक्षएडवोकेट सुभाष सचदेवा नेकहा कि बेटियों पर बढ़ते अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए हमें अपने बच्चों को संस्कारित करना होगा। ग्रामीण स्तर पर लड़कियों की उच्च शिक्षा की अलख जगानी होगी। महिलाओं को बराबरी पर लाने के लिए हर फिल्ड में 50 प्रतिशत रिजर्वेशन दी जानी चाहिए। लड़कियां मां-बाप के लिए अधिक विश्वसनीय होती हैं।
अनर्गल बयानबाजी पर लगे रोक
स्वयंसिद्धासोसायटी की अध्यक्षडॉ. रंजना शर्मा नेकहा कि महिलाओं के मान-सम्मान में बढ़ोतरी के लिए उनके प्रति अनर्गल बयानबाजी पर घर से ही रोक लगनी चाहिए। बच्चों में संस्कारों का आगाज करना होगा। इसके अलावा महिलाओं को प्रॉपर्टी में वास्तविक रूप से हक मिलना चाहिए। बेटियों के प्रति समाज के व्यवहार सोच में बदलाव आना चाहिए, जिससे वे स्वयं को सुरक्षित महसूस करें।
दहेज प्रथा को खत्म करना होगा
समाजसेवीकेएलचावला नेकहा कि प्रत्येक व्यक्ति को लड़कियों के प्रति अपने माइंड को सेट करना होगा। उनको अपने मन में यह बात बैठानी होगी कि दूसरे की बेटी मेरी बेटी, दूसरे की बहन बेरी बहन। दहेज प्रथा जैसी बुराइयों को भी खत्म करना होगा। लड़कियों को हर क्षेत्र में लड़कों के बराबर अवसर प्रदान करने होंगे ताकि उन्हें आगे बढ़ने के अवसर लगातार मिलते रहें।
बेटियों को मिले सामाजिक सुरक्षा
समाधांचलसंस्था की अध्यक्षएडवोकेट संतोष यादव नेकहा कि सरकारी गैर-सरकारी तौर पर किए गए प्रयासों से काफी हद तक हम बेटा बेटियों के बीच असमानता की खाई को पाटने में सफल हुए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। सबसे अधिक जरूरत है सोशल सिक्योरिटी की। एक से अधिक लड़की होने पर पेरेंट्स को कई तरह की चिंता होने लगती है। लड़कियों को सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।
करनाल. दैनिकभास्कर कार्यालय में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को लेकर सामूहिक चर्चा का आयोजन किया गया। इस दौरान कानून, शिक्षा, स्वास्थ्य समाजसेवा के क्षेत्र से जुड़े शहर के बुद्धिजीवियों ने अपने विचार व्यक्त किए।