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सहायता मिलने पर जगा दूसरों की मदद का जज्बा, कर रहे रक्तदान

5 वर्ष पहले
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2 सकारात्मक बदलाव

गरीब बच्चों को पढ़ाने के लिए छोड़ी थी कमांडेंट की नौकरी

दुनियामें मां जैसा कोई गुरु नहीं हो सकता। मां की इच्छा थी कि बेटा अशिक्षा का अंधियारा दूर करे। इसके लिए बेटे ने नौकरी छोड़कर शिक्षण कार्य शुरू कर दिया। राह में परेशानियां आईं, लेकिन मां का मार्गदर्शन काम आया। वर्ष 1992 में 28 बच्चों से शिक्षा का दीप जलाया, जो आज ढाई हजार बच्चों को ज्ञान का प्रकाश दे रहा है।

बात 1989 की है। उस समय कंबाइंड पैरामिलिट्री फोर्स एग्जाम के तहत कुलजिंद्र मोहन सिंह बाठ को असिस्टेंट कमांडेंट की नौकरी मिल गई थी। बेटे से दूर होने के कारण मां कुलवंत कौर बीमार पड़ गईं। बाठ अपनी ट्रेनिंग के दौरान ही वापस लौटे। राष्ट्रपति से सम्मानित शिक्षिका मां ने इच्छा जताई कि उनका इकलौता बेटा समाज में शिक्षा का उजियारा फैलाए। 1992 में रामनगर में किराए के कमरों में 28 बच्चों से स्कूल की शुरुआत हुई। बाठ के अनुसार परेशानी तो हुई, लेकिन लोगों के सहयोग बैंक लोन से स्कूल का काम रुकने नहीं दिया।

कुलजिंद्र मोहन सिंह बाठ।

प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा बेस्ट स्कूल ट्रॉफी, भारत सरकार की ओर से स्कूल को ग्रीन अवार्ड, आईएसओ 9001/2008 प्रमाण पत्र, स्वामी विवेकानंद नेशनल स्कूल ऑफ एक्सीलेंस अवार्ड। बाठ ने बताया कि जीवन में कोई लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ना चाहिए। लक्ष्य समाज राष्ट्र कल्याण की भावना का होना चाहिए। युवाओं को नशे और साइबर क्राइम से दूर रहकर अच्छे काम का नशा लेना चाहिए।

रिकाॅर्ड संख्या में रक्तदान करने पर राजेंद्र मदान उर्फ रामा को गत कांग्रेस शासन में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के हाथों अवार्ड प्राप्त हो चुका है। इस अवार्ड पर लिखा हुआ था कि ब्लड डोनर इस रीयल हीरो। इस कार्यक्रम में पूरे देश से ब्लड डोनर बुलाए गए थे। हरियाणा से इस अवार्ड को प्राप्त करने वाले वे अकेले थे। जबकि इसके अलावा कई सामाजिक धार्मिक संस्थाओं द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।

फोटोग्राफर एसोसिएशन के चेयरमैन राजेंद्र मदान उर्फ रामा का कहना है कि जब तक जिंदगी है तब तक थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए ब्लड कैंप लगाते रहेंगे। उनका मानना है कि जब तक जियो रक्तदान करते रहो। उन्होंने बताया कि वे हर साल स्वामी ज्ञानानंद महाराज के जन्म दिन 15 मई को उसी स्थान पर रक्तदान कैंप लगाते हैं, जहां स्वामी ज्ञानानंद महाराज उस दिन होते हैं। हमें रक्तदान के साथ अपनी आंखें भी दान कर देनी चाहिए।

वे लोग जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए रक्तदान करते थे। उन्होंने अस्पताल में अपना पता संपर्क बताया हुआ था। लेकिन इस दौरान सन 1995 में उनकी गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज से मुलाकात हुई। उन्होंने उनके इस कार्य की काफी सराहना की और उनके संगठन को नया नाम श्रीकृष्ण कृपा युवा मंच दिया। इसके साथ ही थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों की मदद करने की दिशा दिखाई।

चेरे भाई की बेटी को रक्त की जरूरत पड़ने पर दर्जनों लोग सहायता के लिए आए तो उनके अंदर दूसरों की सहायता के लिए जज्बा जगा। इस दौरान वे कॉलेज से मनाली टूर पर गए तो रास्ते में उन्होंने जगह-जगह होर्डिंग पर लिखा देखा कि रक्तदान महादान। उसने अपने मित्रों रवि अरोड़ा, सुरेंद्र बतरा, आरएस मलिक नरेश संधू आदि से बात की और यंग ब्लड डोनर क्लब का गठन किया और रक्तदान करने लगे।

{ कूड़ा बीनने वाले बच्चों के लिए रविवार को स्कूल खोलने की तैयारी

उम्र 46साल,ब्लड कैंप लगाए 44,खुदरक्तदान कर चुके 113बार

भास्कर न्यूज | करनाल

चचेरेभाई की बेटी दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो गई, उसके पित की थैली फट गई थी। अस्पताल में डाॅक्टर बोले तुरंत 8 यूनिट रक्त चाहिए। एक पल तक मुझे कुछ नहीं सूझा, लेकिन जैसे ही अपने कुछ दोस्तों को सूचना भेजी तो मदद के लिए दर्जनों लोग गए। 8 यूनिट रक्त मिलने में देर नहीं लगी। उसी दिन से मैंने सोच लिया था क्यों वे दूसरों के मददगार बनें। तब से आज तक वे 46 साल की उम्र में 44 रक्तदान शिविर लगा चुके हैं और 113 बार खुद रक्तदान कर चुके हैं। इन शख्स का नाम है राजेंद्र मदान उर्फ रामा। शहर में इनको रामा के नाम से ही लोग जानते हैं।

1988में पहली बार दिया था रक्त : रामाकहते हैं कि उसने वर्ष 1988 में पहली बार तब रक्त दिया था जब उसके दोस्त की मां बीमार होने पर बतरा अस्पताल दिल्ली में दाखिल थी। उसे रक्तदान करने से जो खुशी हुई थी उसे वह शब्दों में बयां नहीं कर सकता।

राजिंद्र मदान।

शिक्षा का प्रकाश फैलाने के प्रयास जारी हैं। कुलजिंद्र पंजाब यूनिवर्सिटी से एमए इकोनॉमिक्स, एमए एलएलबी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से बीए, बीएड और एमएड हैं। उन्होंने बताया कि संघर्ष के बाद सफलता मिली। दून पब्लिक स्कूल, दून वाटिका, दून इंटरनेशनल स्कूल के रूप में मां का सपना साकार हुआ। बाठ ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल के आह्वान पर जिले के 6 सरकारी विद्यालयों को गोद लिया है। इस कार्य में उनका भागीदार ओपीएस विद्या मंदिर स्कूल है। वर्तमान में दून एजुकेशन सोसायटी के अंतर्गत झुग्गी झाेपड़ी के 200 बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। सामाजिक सांस्कृतिक संस्था निफा के साथ मिलकर झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। उनको पुस्तकें आदि भी भेंट की जाती हैं। इसके साथ ही एमडीडी बाल भवन के अनाथ बच्चों को उनका स्कूल शिक्षा देने का काम कर रहा है। बाठ ने बताया कि शिक्षा का अधिक से अधिक प्रकाश फैलाने की जिद के तहत अब वे संडे स्कूल खोलने का निर्णय कर चुके हैं, जिसमें कूड़ा बीनने वाले बच्चों को शिक्षा दी जाएगी। 75 वर्षीय कुलवंत कौर बाठ दून एजुकेशन सोसाइटी की चेयरमैन, कुलजिंद्र मोहन सिंह बाठ सोसायटी के महासचिव हैं।

थैलीसीमिया से पीड़ित बच्चों के लिए श्रीकृष्ण कृपा युवा मंच के तहत साल में दो बार रक्तदान शिविर लगाया जाता है। थैलीसीमिया ग्रस्त बच्चों के लिए अब तक 44 कैंप लगाए जा चुके हैं, जिनमें दानवीरों द्वारा 10 हजार यूनिट ब्लड दान किया जा चुका है। शहर में उनकी जानकारी में 57 बच्चे थैलीसीमिया से पीड़ित हैं।

पढ़ रहे झुग्गी-झोपड़ी वाले बच्चे

लोगों को समझाया महादान का महत्व

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