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कृषि नीति और जलवायु परिवर्तन किसान आत्महत्या के कारण : सेन

5 वर्ष पहले
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कुरुक्षेत्रविश्वविद्यालयके भूगोल विभाग में चल रही तीन दिवसीय भारतीय भूगोलवेत्ताओं की अंतर राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन 24 सत्र आयोजित किए गए। इसमें 250 से अधिक शोधकर्ताओं और प्राध्यापकों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए।

इन सत्रों में भूमि अधिग्रहण और इसके सामाजिक, आर्थिक प्रभाव, पर्यावरण की समस्याएं, स्मार्ट सिटी और शहरी वातावरण, भू-संसाधन नीतियां और कृषि पर जलवायु तापन के प्रभावों पर चर्चा हुई। जेएनयू नई दिल्ली से प्रो. सुचित्रा सेन ने किसानों की आत्महत्या से जुड़े सवालों पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि किसानों की आत्महत्या का सीधा संबंध सरकार की कृषि नीति और जलवायु में हो रहे परिवर्तन से है। उन्होंने कहा कि कपास की बीटी और कोटन वेरायटी उगाने वाले किसान ही सबसे अधिक आत्महत्या के शिकार हो रहे हैं। एमडी यूनिवर्सिटी रोहतक की प्रो. नीना सिंह ने हरियाणा में आर्थिक विकास और इसके कारीगरों पर प्रभाव विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया।

उन्होंने कहा कि हरियाणा में पिछले दो दशक में आर्थिक परिवर्तन के साथ तेजी से कामगारों के काम में भी परिवर्तन हुआ। इससे अनौपचारिक सेक्टर में काम करने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। ढाका विश्वविद्यालय बांग्लादेश से आए प्रतिभागी विश्वजीत नाथ ने भूमि लवणता और भूमि उपयोग विषय पर अपना शोधपत्र पढ़ा। उन्होंने दूर संवेदन और उपग्रह से प्राप्त चित्रों के आधार पर बांग्लादेश में लवणता के भूमि उपयोग पर पड़े प्रभाव के बारे में बताया।

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