\"त्यागमय होना चाहिए मनुष्य का जीवन\'
कुरुक्षेत्र |गांव चनारथल बस्ती में आयोजित भागवत कथा में कथावाचक शुकदेवाचार्य ने कहा कि मनुष्य का जीवन त्यागमय होना चाहिए। भगवान श्रीराम ने अपने पिता राजा दशरथ के सत्य वचन की रक्षा के लिए राजपाठ छोड़ कर वन की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने कहा कि भगवान की प्राप्ति के लिए मानव को कामिनी कंचन से कोसों दूर रहना चाहिए। इस दुनिया को समझने के दो मुख्य मार्ग हैं-प्रेम एवं श्रेय मार्ग। प्रेम मार्ग आरंभ में बड़ा सुगम मीठा लगता है। खाया पिया और मौज उड़ाया, लेकिन परिणाम बड़ा भयानक और कड़वा होता है। इस मार्ग पर चलने वाले लोग कामिनी कंचन के पीछे भागते हैं। दूसरा श्रेय मार्ग है, जिसमें मानव को बड़ी कठिनाई आती है, लेकिन परिणाम बड़ा मीठा होता है। इस मार्ग में साधक को कठिन साधना करनी पड़ती है। कथा के यजमानों ने सर्वदेव पूजन करके कथावाचक को तिलक लगाया। श्रीकृष्णावतार से पूर्व उन्होंने अम्बरीश चरित्र, रामावतार और चंद्रवंशीय राजाओं का वर्णन सुनाया। कथा के दौरान पं. आचार्य विनोद मिश्र, अरुण शर्मा, घनश्याम शर्मा और सीताराम कश्यप ने मधुर भजन सुनाए। भजनों के पश्चात आरती प्रसाद वितरण हुआ।