अब ग्रीन कैमिस्ट्री बचाएगी पर्यावरण
बनाए मॉली क्यूब
कैंसर की दवा प्राथमिक चरण में
ग्रीन केमिस्ट्री जरूरी
देशमेंहरित क्रांति आने के बाद अब देश और दुनियाभर के वैज्ञानिक ग्रीन कैमिस्ट्री की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि केमिस्ट्री की रिएक्शन का पर्यावरण को कम नुकसान हो। इसी को लेकर भारत के वैज्ञानिक 12 नियमों को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं। देश और दुनिया में ग्रीन केमिस्ट्री की जरूरत बिगड़ते पर्यावरण के कारण महसूस हुई।
इसके बाद से केमिस्ट्री के प्रयोगों के दौरान कम से कम वेस्ट पदार्थ निकालने पर काम हो रहा है। दिल्ली यूनिवर्सिटी का कैमिस्ट्री विभाग भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। केयू में केमिस्ट्री विभाग की ओर से आयोजित 51वें राष्ट्रीय अधिवेशन में हिस्सा ले रहे दिल्ली यूनिवर्सिटी के केमिस्ट्री विभाग के शिक्षक डॉ. अखिलेश वर्मा से दैनिक भास्कर ने की उनके शोधकार्य को लेकर खास बातचीत।
डॉ.अखिलेश वर्मा ने बताया कि उन्होंने कैंसर, मलेरिया और टीबी के इलाज में प्रयोग होने वाली दवाओं के 200 से अधिक मॉलीक्यूब को तैयार किया है। उन्होंने बताया कि वे मुख्य रूप से टेंडम रिएक्शन और अल्काइन केमिस्ट्री पर काम कर रहे हैं जिसमें रिएक्शन के स्टेप को कम किया जाता है। इससे मैनपावर भी बचती है और रिएक्शन से कचरा भी कम निकलता है।
डॉ.अखिलेश वर्मा ने बताया कि उनके द्वारा कैंसर की दवा के लिए तैयार किए गए मॉलीक्यूब के प्राथमिक चरण के टेस्ट चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका के साथ मिलकर कैंसर की दवा तैयार की जा रही है। डॉ. वर्मा ने बताया कि अगर सभी टेस्ट मॉलीक्यूब ने पास किए तो ग्रीन केमिस्ट्री से तैयार की गई कैंसर की दवा बाजार में लोगों को उपलब्ध हो पाएगी। उन्होंने बताया कि इस दवा को बनाने में रिएक्शन कम होने के कारण यह पर्यावरण के लिए भी उपयोगी साबित होगी।
डॉ.अखिलेश वर्मा ने बताया कि वर्ष 1967 में अमेरिका की ओहायो नदी में वेस्ट पदार्थों के मिलने के कारण आग लग गई थी। इस हादसे में कई लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा भी कई बार कैमिस्ट्री की रिएक्शन के कारण पर्यावरण से खिलवाड़ हो चुका है, जिसके चलते 1990 के बाद ग्रीन केमिस्ट्री की जरुरत महसूस होने लगी।