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विशेषज्ञ बोले, भू-अधिग्रहण नीति में अभी खामियां है, टकराव रोकने वाली हो नीति

5 वर्ष पहले
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कुरुक्षेत्रविश्वविद्यालयके ऑडिटोरियम में गुरुवार को भूगोल विभाग की ओर से भारतीय भूगोलवेताओं का तीन दिवसीय सम्मेलन अंतर राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। संगोष्ठी में भू-संसाधन नीतियां, कृषि और बढ़ते नगरीय औद्योगिक परिवेश विषय पर आयोजित सम्मेलन में देश दुनिया के कई देशों से 350 से अधिक भूगोल वेता हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति हरदीप कुमार ने किया।

संगोष्ठी में भूमि अधिग्रहण नीति के कारण पैदा होने वाले टकराव को रोकने पर चर्चा हुई। संगोष्ठी के अध्यक्ष जामिया मीलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के प्रो. एमएच कुरैशी ने कहा कि भूमि अधिग्रहण नीति इस बात को ध्यान में रखते हुए बननी चाहिए कि इससे सरकार और किसानों के बीच टकराव पैदा हो। उन्होंने कहा कि टकराव पैदा होने के कारण प्रोजेक्ट तो अटकते ही हैं साथ ही देश को नुकसान भी होता है।

छोटे किसान प्रभावित

सम्मेलनके मुख्य वक्ता जेएनयू के प्रो. अमिताभ कुंडू ने कहा कि आर्थिक नीतियों का भूमि की मार्केट पर प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में इसका प्रभाव साफतौर पर महसूस किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से अब भूमि का अधिग्रहण हो रहा है, इसका सबसे बुरा प्रभाव छोटे मध्यम किसानों पर पड़ने वाला है। जिस किसान के पास अधिक जमीन है, वह इससे मिले पैसे का अन्य कार्यों के लिए प्रयोग करेगा, लेकिन छोटे किसानों को इससे कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने कहा कि आर्थिक नीतियां बनाते समय हमें इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। केयू कुलपति हरदीप कुमार ने कहा कि शहरीकरण से पर्यावरण खेती दोनों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। विकास के लिए शहरीकरण जरूरी है, लेकिन इसका खेती लोगों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़े, इसके लिए भूगोलवेताओं को अध्ययन कर समाधान निकालना चाहिए। उन्होंने कहा कि जमीन से लोगों का जीवन जुड़ा है।

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