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वैदिक धर्म में पितृपक्ष का स्थान महत्वपूर्ण : सरस्वती
बंचारीस्थित महर्षि दयानंद स्मारक केंद्र में सत्संग का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता वैदिक धर्म प्रचारिणी सभा के प्रवक्ता स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती थे। उन्होंने कहा कि वैदिक धर्म में पितृपक्ष का महत्वपूर्ण स्थान है। पितृपक्ष का अभिप्राय है माता-पिता, दादा-दादी आचार्य आदि की सेवा सुश्रुषा करना। पितृपक्ष दो प्रकार के होते हैं। इनमें से एक श्राद्ध दूसरा तर्पण है। माता-पिता आदि पितरों की सेवा करना, उनकी आज्ञा का पालन करना तथा उनके प्रति श्रद्धा भाव रखना ही श्राद्ध कहलाता है। अन्न जल, भोजन, फल वस्त्र आदि से उनको तृप्त करना तर्पण कहलाता है। उन्होंने कहा कि श्रद्धापूर्वक जीवित पितरों को हर प्रकार से संतुष्ट रखना ही श्राद्ध तर्पण है। उन्होंने कहा कि जीवित माता-पिता की उपेक्षा करना सामाजिक दृष्टि से अपराध धार्मिक दृष्टि से पाप है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक वर्ष अश्विनी मास का कृष्ण पक्ष पितृपक्ष कहलाता है। पौराणिक लोग पितृपक्ष में अपने मृतक पितरों की तिथि के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन आदि कराकर वस्त्र और दक्षिणा देकर श्राद्ध तर्पण आदि करते हैं।
उन्होंने कहा कि वैदिक धर्म कहता है कि पितरों का श्राद्ध तर्पण वर्ष में एक बार नहीं बल्कि प्रतिदिन करना चाहिए। मृतकों के लिए पितृपक्ष में ही श्राद्ध करना अज्ञानता का प्रतीक है। उन्होंने कहा महर्षि दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में स्पष्ट लिखा है कि श्राद्ध, तर्पण पिंडदान मरे हुए जीवों को नहीं पहुंचता।
इस मौके पर सुरन सिंह, किशन सिंह, ओमप्रकाश कटारिया, खडक सिंह, गोपाल र्य, अमित कुमार शास्त्री, शारदा प्रसाद, विवेक भाटिया, हेतराम शर्मा, धर्मेन्द्र, नरेश कुमार आदि मौजूद थे।