- Hindi News
- डिस्पेंसरियों में मरीजों को अक्सर नहीं मिलते डाॅक्टर
डिस्पेंसरियों में मरीजों को अक्सर नहीं मिलते डाॅक्टर
> स्वास्थ्य विभाग को लोगों के स्वास्थ्य की नहीं है कोई परवाह
भास्करन्यूज | बराड़ा
ग्रामीणइलाकोंमें बनी डिस्पेंसरियां केवल नाम की बनकर रह चुकी हैं। इन में लोग इलाज कराने को तो जाते हैं लेकिन वहां लटकते ताले देख मायूस लौट आते हैं। यह हाल तकरीबन हर ग्रामीण आंचल में बनी डिस्पेंसरियों का है। इसके चलते लोग झोलाछाप डाॅक्टरों के पास इलाज कराने को मजूबर हैं। ऐसा नहीं है कि स्वास्थ्य विभाग को जनता के स्वास्थ्य के साथ हो रहे इस खिलवाड़ के बारे में जानकारी नहीं है लेकिन सबकुछ जानते हुए भी स्वास्थय विभाग आंख मूंंद तमाशाबीन हो तमाशा देख रहा है, तो स्वास्थ्य विभाग अपनी डिस्पेंसरियों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा है और ही झोलाछाप डाॅक्टरों को लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलावाड़ करने से रोक रहा है। एक ओर प्रदेश सरकार प्रदेश में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने का ढिंढोरा पीट रही है तो वहीं स्वास्थ्य विभाग अिधकारी इसके प्रति जरा भी गंभीर नहीं है।
उपमंडल बराड़ा के अधीन आने वाले गांव तंदवाल में बनी स्वास्थ्य विभाग की डिस्पेंसरी एक बार फिर से सुर्खियों में है। ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के चलते ग्रामीण इलाकों में लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल करने वाली डिस्पेंसरियों की देखभाल करना स्वास्थ्य विभाग के बस की बात नहीं रह गई है। इसके चलते ग्रामीण इलाकों में बनी डिस्पेंसिरयां कबाड़खाने में तब्दील होती जा रही हैं। इनकी सुध लेने का समय शायद किसी के पास हो। ग्रामीणों का कहना है कि उनके गांव के लोगों को डिस्पेंसरी का कोई भी लाभ नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीणों की मानें तो उनके गांव में डिस्पेंसरी कभी-कभार ही खुलती है। डिस्पेंसरी खुलने और बंद होने का समय फिक्स नहीं है।
कभी-कभारखुलती है डिस्पेंसरी: ग्रामीणोंकी मानें तो उनके गांव में स्थित डिस्पेंसरी के खुलने का कोई भी समय नहीं है। जब स्वास्थ्य कर्मी की मर्जी होती है तब जाते हैं जब मर्जी होती है चले जाते हैँं। हालांकि विभाग की ओर से डिस्पेंसरी खुलने का समय सुबह 9 बजे और बंद होने का समय शाम 4 बजे होता है लेकिन शायद ही कोई दिन होगा जिस दिन डिस्पेंसरियां टाइम पर खुली हों।
गांव तंदवाल स्थित बंद पड़ी डिस्पेंसरी।