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पहले होता था जनता का न्याय, अब करती है जनता न्याय
बेरीमें एक है स्वराजगंज। आजादी के समय इसी जगह से स्वराज यानी हमारे राज का बिगुल स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों ने फूंका था। स्वराजगंज आजादी से पहले ब्रिटिश राज में भी न्याय प्रिय व्यवस्था के रूप में प्रसिद्ध था। इसकी गवाही अब भी यहां के वाशिंदों द्वारा सहेजी गई इमारतें देती हैं। पहले यहां जनता को न्याय देने के लिए जन अदालत लगती थी।
अब राजनीतिक दलों के नेताओं को यहीं से जनता का आशीर्वाद मिलता है। ब्रिटिशकाल में सामाजिक न्यायालय को बेरी में इसी स्थान से शुरू किया गया था। बेरी में माता भीमेश्वरी के मंदिर के बाद देश भर में यही जन अदालत बेरी की प्रसिद्धी बनी। स्वराजगंज में ब्रिटिश काल में सार्वजनिक अदालतें लगती थीं और लोगों को न्याय मिलता था। हालांकि अब अदालत की जगह आलीशान कोठी ने ले ली है। फिर भी इस न्याय व्यवस्था के स्वरूप को जस का तस सहेजकर रखा गया है। जहां पहले अदालत लगती थी वो इमारत क्षेत्र के निवासी डाॅ. जगदीश कादियान के पास है। जिस स्थान पर अदालत लगती थी। सुनवाई के बाद जेल में अपराधियों को बंद किया जाता था आज भी उसका स्वरूप नहीं बदला है। बेरी के स्वराजगंज में स्थित इस इमारत को देखने के लिए आज दूर-दूर से लोग आते हैं। भवन मालिक परिवार से जुड़े जयवीर कादियान ने बताया कि बेरी की इस प्रसिद्धी को हमारे परिवार ने नष्ट नहीं होने दिया है। परिवार को इस ऐतिहासिक इमारत में रहने का गर्व भी है।
लाला रामेश्वर दास गोपाल थे जज
बेरीके मास्टर शिवशंकर ने बताया कि बेरी के स्वराजगंज में सार्वजनिक मामलों को निपटाने के लिए अंग्रेजी सरकार ने जन अदालत की स्थापना कराई। आजादी से पहले बेरी के स्वराजंगज में लाला रामेश्वर दास, गोपाल छारिया अवैतनिक न्यायाधीश बनाए गए थे। स्वराजगंज में जब अदालत लगती थी तब दोनों रास्तों पर दरबान खड़े रहते था। पूरे इलाके के मुकदमे निपटाए जाते थे। आरोपी फरियादी पक्ष से कोई वकील नहीं होता था। सामाजिक भाईचारा के तहत न्याय व्यवस्था नि:शुल्क होती थी। यह अदालत 6 माह तक कारावास की सजा आरोपी को दे सकती थी। अदालत में बनी जेल में कैदी को रात को ठहराया जाता था। फिर सुबह रोहतक जेल भेज दिया जाता था। यहां दिए गए फैसले पूरे इलाके में मान्यता रखते थे।
अबयहीं से राजनीतिक न्याय की होती है शुरुआत
आजादीके लड़ाई का बिगुल इसी स्वराजगंज से बजा था। सीएम भूपेंद्र हुड्