अंग्रेजों से मिलती है राजनेताओं की सोच
विभिन्नजनसंगठनों के मंच ने पटवार भवन में संगोष्ठी की। इसके मुख्य वक्ता पूर्व अध्यक्ष इतिहास विभाग, जाट कालेज हिसार डाॅ.एमएम जुनेजा थे। गोष्ठी मेें 6 दिसंबर 1992 को कुछ साम्प्रदायिक शक्तियों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराए जाने की घटना पर चर्चा की गई। जुनेजा ने कहा कि गिराया जाना यह एक अहम घटना थी। क्योंकि हमारा संविधान इस बात की गारंटी देता है कि भारत का हर नागरिक अपनी अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी धर्म चुन सकता है। किसी भी रीति-रिवाज से पूजा पाठ कर सकता है। 6 दिसम्बर को जहां हमारे देश में रहने वाले एक विशेष धर्म के लोगों को इस बात से ठेस पहुंची वहां पर हमारी संवैधानिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन हुआ। इत्तफाक से 6 दिसम्बर भारत को संविधान के निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर साहेब का भी निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है।
मजहबके नाम पर किया एकता को कमजोर
उन्होंनेबताया कि किस तरह अंग्रेज हुकूमत जलियांवाला बाग के खूनी कांड के बाद भारत के लोगों के प्रचंड गुस्से और रोष का शिकार हो रही थी। जिसमें सभी हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख इकट्ठे होकर लड़ रहे थे। शातिर विदेशी हुकूमत ने मजहब के नाम पर लोगों में नफरत पैदा करके दंगे करवाए और हमारी एकता को कमजोर किया ताकि आजादी का आंदोलन ठण्डा पड़ जाए।
1927-28 तक भारत के अनेक भागों में दंगे हुए। ठीक इसी समय भगत सिंह और उनके साथियों ने इस खतरे को देखते हुए आजादी को क्रांतिकारी और समाजवादी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दिशा दी और सांप्रदायिकता को ऊपर लेख लिखे। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भी अपने राजनेताओं की सोच अंग्रेजों से मिलती हुई लगती है और वोट के लिए जाति-धर्म का कार्ड खेलते है जिसका नतीजा दंगे होते हैं और आम आदमी मारा जाता है। गोष्ठी का मंच संचालन मोहन लाल नारंग ने किया। कामरेड हरनाम सिंह ने भी आज के आने वाले खतरों के बारे में बताया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भरत सिंह परिहार एडवोकेट ने की। गोष्ठी में एडवोकेट देवीलाल, सुमनलता सिवाच, रामकुमार बहबलपुरिया, प्रो. राज बहादर यादव, भूप सिंह, राजपाल मिताथल, जसवंत कौर, दलबीर सिंह, संजीव गेरा, राजबाला, जंगीर कौर, राजकुमार निराणियां आदि ने भी भाग लिया।