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परोपकार करने वाला ही भक्तिमार्ग पर चलता है
जोइंसान पुण्य कार्य करता है, परोपकार परमार्थ कर परहित में अपना जीवन आहुत करता है वही इंसान जीवन में भक्ति के मार्ग पर चल सकता है। छल प्रपंच और ठगी से अपने मन रूपी पात्र को रिक्त किए बिना हम उसमें भक्ति धन को नहीं भर सकते हैं। यह सत्संग वाणी हुजूर कंवर साहेब महाराज ने साध संगत को परोसी। फतेहाबाद के राधा स्वामी आश्रम में सत्संग फरमाते हुए हुजूर कंवर साहेब महाराज ने फरमाया कि जीवन रूपी रस मिथ्या है। भय बिना प्रीत नहीं है इसलिए काल से भयभीत रहो ताकि परमात्मा से हम विमुख रहें। प्रभु सिमरन से रहित जीवन खार समान है। यह मत भूलो कि इंसानी चोला बड़ी मुश्किल से मिला है।
इसलिए अपने आपको उस छाज के समान बनाओ जो थोथी और निर्थक वस्तु को बाहर उछाल देता है और सार वस्तु को रख लेता है। ऐसा जीवन तभी संभव है जब करनी करने वाले संत पुरुष की शरणाई मिल जाती है। संत संसार का कल्याण करने आते हैं। संतमत सबसे ऊंचा मत है और राधा स्वामी मत सर्वोच्च है, क्योंकि यह मत इंसान को सांसारिक पाखंडों से छुटाकर आत्म देव का दर्शन करवाता है।
यही मत है जो मनुष्य को अध्यात्म के साथ-साथ सामाजिकता भी परोसता है। गुरु महाराज जी ने फरमाया कि-जहां सुमिति वहां सुख नाना, जहां कुमति वहां दुख विधाना। उन्होंने कहा कि व्यवहार में परिवर्तन लाए बिना, भक्ति की बड़ी बड़ी बातें करने से कुछ भी हासिल नहीं होता। आप व्यवहार अच्छा रखोगे, दिल में दया भाव रखोगे और परमार्थ का कार्य करोगो तो अमर हो जाओगे। नाम का सुमिरन नित प्रति करना, प्रभु को किसी विधि से स्मरण करो, यह आवश्यक नहीं है कि आप किस विधि से उन्हें स्मरण कर रहे हैं।
यह आवश्यक है कि उस परमशक्ति की अधीनता में रहते हैं। प्रभु नाम को किसी विधि से लो, वह काम आएगा। परमात्मा को हरदम सुमिरते रहोगो तो बुरे से बचे रहोगे। कर्म करो लेकिन अकर्म होकर रहो। गुरु महाराज जी ने फरमाया कि गुरु के नूरी दर्शन की चाह होनी चाहिए।
उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रवचन करते कंवर साहेब महाराज।