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वैराग्य जीवन जीने सेे विकार मिटते हैं: यमुना

5 वर्ष पहले
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मुगलपुरास्थित दुर्गा मंदिर में रामकथा के पांचवे दिन साध्वी यमुना दीदी मां ने वैराग्य के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि वैराग्य जीवन जीने से मन के विकारों का नाश होता है। इससे ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग सरल हो जाता है। मनुष्य को सांसारिक मोहमाया को त्यागकर ईश्वर की भक्ति में लीन रहना चाहिए। ईश्वर भक्ति ही परम सुख का आधार है। भगवान राम का उदहारण देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम ने पिता के वचन की पूर्ति के लिए राजपाट का त्याग कर दिया था।

कथा में साध्वी यमुना ने भगवान राम के वनवास प्रस्थान के वर्तांत का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि एक बार रानी केकैयी ने युद्ध में राजा दशरथ की जान बचाई थी। राजा ने उसके बदले रानी को दो वरदान मांगने को कहा था। उस समय रानी ने वरदान लेने से मना कर दिया। दशरथ ने चारों राजकुमारों द्वारा शिक्षा ग्रहण पूर्ण करने के बाद राम को अयोध्या का राजा बनाने की घोषणा कर दी। राम को राजा बनाने की सूचना से अयोध्या नगरी में खुशियों की लहर दौड़ गई।

इस पर रानी केकैयी की दासी मंथरा ने रानी को बहलाकर उसके बेटे भरत को राजा घोषित करवाने के लिए मनाया। राजा दशरथ को मनाने के लिए उसने केकैयी को उसके द्वारा दिए गए वरदान याद दिलाने को कहा। साध्वी ने बताया कि दासी की बातें में आकर रानी ने राजा से भरत के लिए राज्य और राम के लिए 14 वर्ष के वनवास की मांग की। दशरथ ने रानी से राम के लिए वनवास के स्थान पर अन्य वरदान मांगने को कहा, लेकिन रानी इसके लिए तैयार नहीं हुई। राजा दशरथ ने वचनों की पूर्ति के लिए राम को वनवास जाने का आदेश दिया।

पिता के वचन की पूर्ति के लिए भगवान राम खुशी-खुशी वन में जाने के लिए तैयार हो गए। इस पर माता सीता और लक्ष्मण ने भी वन में साथ जाने का आग्रह किया। साध्वी ने कहा कि भगवान राम ने वन में जाकर संसार के सामने त्याग एवं पितृभक्ति का उदहारण प्रस्तूत किया था। राम कथा के दौरान मंदिर के प्रधान गुलशन नारंग, विजय मग्गो, महेश, सतीश मधु, नंदलाल नारंग, मदन ठकराल, सुरेंद्र मैहता आदि उपस्थित थे।

यमुना दीदी

गोहाना . दुर्गामंदिर में आयोजित रामकथा में प्रवचन सुनते हुए श्रद्धालु महिलाएं।

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