- Hindi News
- अधिग्रहण के बाद ली जा रही है अवार्ड मंजूरी
अधिग्रहण के बाद ली जा रही है अवार्ड मंजूरी
झज्जरमें चार हुड्डा सेक्टरों के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला कानूनी दांव पेंच में फंसता जा रहा है। क्षेत्र की 1125 एकड़ जमीन अधिग्रहण करने के मामले में रोहतक के जमीन अधिग्रहण कार्यालय यानि एलओ की ओर से मनमानी हो रही है। जिला प्रशासन की मानें तो 4 जुलाई को झज्जर के चार सेक्टरों के लिए जमीन अधिग्रहण का अवार्ड घोषित हो चुका है, जबकि सच्चाई यह है कि एलओ कार्यालय में अभी तक समूचे सेक्टरों का अवार्ड ही नहीं लिखा गया है।
इनकी ओर से सेक्टर सात के अवार्ड के लिए उच्च अधिकारियों से मंजूरी ली जाने की बात कही जा रही है। एलओ विभाग द्वारा एक तरफ अवार्ड की प्रति आमजनता को उपलब्ध कराने और दूसरी ओर इसकी अब पांच महीने के बाद मंजूरी ली जाने की बात अधिग्रहण व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठा रही है। इस स्थिति के चलते पूर्व की हुड्डा सरकार के दौरान जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अदालत में चुनौती देने वाले किसान एवं भू-स्वामियों में रोष बना है।
पूर्व की हुड्डा सरकार की ओर से 7 जुलाई 2011 को झज्जर के हाईवे बाइपास और अंदर के रिंग रोड के बीच की करीब 1125 एकड़ कीमती जमीन पर अधिग्रहण का सेक्शन चार लागू किया। तकनीकी व्यवस्था के तहत दो साल के भीतर अवार्ड घोषित किए जाना था। अन्यथा अधिग्रहण की व्यवस्था स्वयं में ही निरस्त हो जाती। अंतिम दिनों में सरकार की ओर से जैसे ही अवार्ड घोषित की तिथि घोषित की गई, किसानों ने विरोध कर दिया। हुड्डा सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में धरना दिया गए। प्रभावित होने वाले किसान सांसद दीपेंद्र हुड्डा से भी मिले, लेकिन इसके बावजूद सरकार ने शहरी आबादी से एक दम करीब सटी हुई इस बहुमूल्य जमीन को अधिग्रहण से मुक्त नहीं किया।
विरोधके बीच 4 जुलाई को हुई थी घोषणा
आखिरकारभारी पुलिस फोर्स और शोर गुल के बीच 4 जुलाई 2014 को अवार्ड की घोषणा कर दी। आक्रोशित किसानों ने यह भी नारा दिया था कि हुड्डा तेरी कब्र खुदेगी, आज नहीं तो कल खुदेगी। रोहतक की चौधर के बावजूद इनका कहना था कि वे किसी को कुर्सी पर बैठना जानते हैं तो उतारना भी जानते हैं। करीब एक सप्ताह तक हुड्डा सरकार के पुतले भी फूंके सहित कई तरह के विरोध हुए। वहीं 4 जुलाई की शाम को मीडिया के समाने एलओ ने दावा किया था कि अवार्ड की घोषणा कर दी गई है। लेकिन अब सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने वाले किसानों