- Hindi News
- विभाग का खेल खराब, दो साल में दो दुकानें ही चढ़ीं किराए पर
विभाग का खेल खराब, दो साल में दो दुकानें ही चढ़ीं किराए पर
दोसाल पहले जिला खेल विभाग ने किराए पर दुकान देने का जो खेल शुरू किया था वो दो साल से खराब पड़ा है। इतने सालों में 20 में से महज दो दुकानें ही बमुश्किल किराए पर चढ़ सकी हैं। सरकार का लाखों रुपया दुकानों को बनाने में लगा, लेकिन दुकानें किराए पर नहीं चढ़ने से विभाग को दुकानों के इस खेल में हार के सिवाए कुछ नहीं मिला।
खेल विभाग ने दो वर्ष 2012 में अपने स्टेडियम पर छिकारा चौक साइड में एक लाइन में 20 दुकानें बनाई थीं। अब मौजूदा समय में महज दुकान संख्या एक छह ही किराए पर हैं, जबकि बाकी के शटरों में जंग लगा रहा है। अब बताया गया कि इस नुकसान की भरपाई के लिए खेल विभाग अपने नियम में कुछ ढील करने के मूड में है। इसके तहत दुकान की धरोहर राशि पांच लाख की बजाए ढाई से तीन लाख रुपए हो सकती है। इससे पहले इस राशि के साथ हुई बोली जितनी बार हुई वो फैल रही है।
इसलिएबनाई थी दुकानें
स्टेडियमसमेत इसके सभी खेल मैदानों के मेंटिनेंस के अलावा यहां लगी स्ट्रीट लाइट के बिजली का बिल का खर्च महीने में करीब डेढ़ लाख रुपए आता है। खेल विभाग की कोई आय नहीं है। ऐसे में ये खर्चा जिला खेल विभाग समिति के चेयरमैन डीसी की तरफ से वहन होता आया है। ऐसे में विभाग की अतिरिक्त आय के लिए ये दुकानें बनाई गईं, लेकिन लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी विभाग के हाथ कुछ नहीं आया।
रेंट कम हो या डिपोजिट
झज्जरजैसे शहर में पांच लाख रुपए की बड़ी रकम दुकान डिपोजिट के रूप में देकर कोई छोटा-मोटा व्यापार नहीं कर सकता। जितनी राशि कोई डिपोजिट में देगा उतने में तो कोई छोटा दुकानदार दुकान में माल भी नहीं ला सकेगा। ऐसे में अगर खेल विभाग को अपनी दुकानों से आय लेना है तो या तो रेंट कम करना होगा या डिपोजिट की राशि घटाना पड़ेगी। -संजयसैनी, व्यापारीद।
हां ये सही है कि विभाग की दुकानें होने के बाद भी हमारी अतिरिक्त आय नहीं हो पा रही है। हम दो दिन पहले भी इस बाबत डीसी सर से मिले थे। अब फिर इस बारे में उनसे मंथन करके पुरानी प्लानिंग बताकर नए सिरे से राय-शुमारी ली जाएगी। सुकन्या,एडिशनलडीएसओ, झज्जर।
प्राइम लोकेशन पर भी लोग नहीं ले पा रहे दुकानें
खेलविभाग की दुकानें शहर के प्राइम लोकेशन पर हैं। इसके बाद भी कोई इनकी ओर आकर्षित नहीं है। कारण ये है कि छह हजार रुपए तो कई दुकानदार दे भी दे,लेकिन पांच लाख रुपए कोई देना नहीं चाहता। कई