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- स्वतंत्रता से पहले जहां लहराया था तिरंगा, आज वहां होता है मदिरापान
स्वतंत्रता से पहले जहां लहराया था तिरंगा, आज वहां होता है मदिरापान
आजादीके बाद हरियाणा के गठन पर झज्जर का नाम भले ही देश के मानचित्र पर उभरा हो, लेकिन ब्रिटिश राज की चूलें झज्जर ने आजादी से पहले हिला दी थीं। झज्जर के ऐतिहासिक टाउन हॉल पर देश की आजादी के 25 साल पहले ही तिरंगा झंडा फहरा दिया था। ये तथ्य देश की आजादी पर लिखे गए सुनहरे हर्फों में अब भी दर्ज है। आज इसी पाक जगह पर आकर शरारती तत्व बेझिझक होकर मदिरा पान समेत अन्य प्रकार का नशा करते हैं।
पुस्कालयसमय खत्म होते ही लगता है जमावड़ा
अंबेडकरचौक पर जहां ये ऐतिहासिक टाउन हॉल की इमारत है। उसमें मौजूदा समय में जिला पुस्तकालय चल रहा है। अब पुस्तकालय के समय सुबह 10 से शाम 5 बजे तक कोई शरारती तत्व यहां नहीं आता, लेकिन इसके बाद देश के क्रांतिकारियों के लिए भी पूज्यनीय माने जाने वाला यह स्थान लावारिस हो जाता है। शाम ढलते ही टाउन गुंबद के पास शराबियों का जमावड़ा लग जाता है।
इसके कैंपस में लोग सुबह-शाम शौच के लिए आते हैं। इन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं होता। दरअसल टाउन हॉल कैंपस के मुख्य द्वार पर कोई गेट नहीं लगा है लिहाजा लोग बेफिक्र होकर यहां आते-जाते रहते हैं। इसी कैंपस में पानी सप्लाई की टंकी और नांदी योजना के तहत आरओ लगा है। लिहाजा इससे जुड़ा स्टाफ भी सुरक्षा के बारे में कोई ख्याल नहीं रखता। आजादी से पहले जिस सीढिय़ों से चढ़कर छत पर देश के मतवाले जमा हुए थे वहां अब फर्श पर जगह-जगह शराब, नमकीन, सोडे की खाली बोतलें बिखरी पड़ीं रहती हैं। कचरा जमा हुआ है। स्थानीय दुकानदारों की माने तो ये स्थान शराब पीने वालों के लिए अस्थाई अहाता बन गया है।
झज्जर. शहर के एतिहासिक टाउन हाॅल में बिखरी पड़ी शराब की बोतलें।
^हम रूटीन वर्क में पुस्तकालय कैंपस की सुरक्षा का पूरा जिम्मा संभालते हैं। सुबह 10 से 5 बजे तक व्यवस्था बनी रहती है। इसके बाद क्या कहा जा सकता है। फिर भी और ध्यान दिया जाएगा। जो भी एजेंसी कैंपस में हैं उन्हें शरारती तत्वों पर नजर रखने के लिए कहा जाएगा। -राजेशकुमार, जिला पुस्तकालय प्रभारी, झज्जर।
झज्जर के टाउन हॉल का इतिहास यह है कि यहां देश की आजादी के 25 साल पहले ही क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश राज की सख्ती के बाद भी तिरंगा झंडा फहरा दिया था। यह वीरता भरा काम झज्जर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. राम श्रीराम शर्मा, राव मंगली राम विशंभर दयाल शर्मा ने वर्ष 1922 में किया था। तब इसकी गूंज ब्रिटेन तक जा पहुंची थी।