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सरकार स्व.दुल्लीचंद को नहीं मानती स्वतंत्रता सेनानी
खापड़वासनिवासी स्व. दुल्लीचंद के परिजनों की माने तो दुल्लीचंद नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना आजाद हिंद फौज के सिपाही थे।
इस कीमत पर ब्रिटिश राज ने उन्हें वर्ष 1940 से वर्ष 1946 तक सिंगापुर में युद्ध बंदी के रूप में कारागार में डाला। देश की आजादी के बाद जब दुल्लीचंद घर आए तब देश भक्ति से ओतप्रोत होकर सेना में भर्ती हो गए। अब दुल्ली चंद के परिवार को पीढ़ा और अपमान ये है कि सरकार उनके पिता को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नहीं मानती। लिहाजा उनकी पेंशन नहीं है। दुल्लीचंद की वीरांगना उमेद कौर कई सालों से अपने पति के स्वत्रंता सेनानी होने के वजूद की लड़़ाई लड़ रही है। उसने पूर्व की हुड्डा सरकार के अलावा मौजूदा खट्टर सरकार की सीएम विंडो में भी अपने पति की स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लगाने की गुहार की है। पुत्र राजवीर ने बताया कि उनके पिता देश की आजादी के बाद ही भारतीय सेना में दफेदार के रूप में तैनात हुए और 1961 में सेवानिवृत्त हो गए। उनकी इस सर्विस की पेंशन के 4 हजार रुपए तो मां को मिल रहे हैं, लेकिन स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन अब तक नहीं लग सकी है।
दुल्लीचंद की वीरांगना और पुत्र के अनुसार उनके पास दुल्लीचंद को मिला एक मेडल और पुराने दस्तावेज भी हैं। साथ ही पहले से ही युद्धबंदी के रूप में पेंशन ले रहे सेनानियों ने भी दुल्लीचंद के युद्धबंदी होने की पुष्टि की है। इसके बाद भी परिवार को कोई राहत नहीं मिली है।
यह भी बता दें कि हरियाणा सरकार प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी अथवा उनके निधन के बाद उनकी वीरांगना को प्रति माह 25 हजार रुपए की पेंशन देती है। वहीं राज्य सरकार की संस्तुति के बाद केंद्र सरकार करीब 20 हजार रुपए की पेंशन देती है। स्व. दुल्लीचंद के पुत्र रामवीर ने बताया कि उनके पिता ब्रिटिश राज में युद्ध बंदी थे। इसका उल्लेख सेना की डिस्चार्ज बुक में है। उस समय एक स्टार भी उन्हें मिला था। वहीं सभी सेना में रहते कुछ मेडल भी उन्हें मिले। इन मेडल का महत्व घर के बच्चों ने नहीं समझा और गांव में आए फेरीवाले को बेचकर कुल्फी खाली। इन तथ्यों के जाने से अब तक पछतावा है। अहम बात यह है कि खापड़वास निवासी स्व. दुल्लीचंद के दस्तावेजों की जांच और उनके समर्थन में पहले से ही युद्ध बंदी के रूप में पेंशन ले रहे स्वतंत्रता सेनानियों की तस्दीक के बाद हरियाणा स्वतंत्रता सम्मान समिति के कई सदस्य दुल्लीचंद के समर्थन में पेंशन का प्रस्ताव पास कर चुके हैं। समिति के सदस्य दूबलधन निवासी ललतीराम ने बताया कि रोहतक में 20 अक्टूबर 2013 को हुई बैठक में ये पास किया गया था।
हम नहीं कह रहे कि दुल्लीचंद स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे
^हमये नहीं कह रहे कि दुल्लीचंद स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे। हमने इसकी तस्दीक जब सेना कार्यालय से कराई तब वहां से लिखकर आया कि दुल्लीचंद आजाद हिंद फौज में सिपाही नहीं थे। लिहाजा दुल्लीचंद की पेंशन अटकी है। अगर सेना लिखकर देती तब कोई प्राब्लम नहीं थी। फिर भी हमने ये केस प्रोटोकॉल में भेजा है, वहां से कोई जवाब नहीं आया है। -हरिरामआर्य, चेयरमैन हरियाणा स्वतंत्रता सम्मान समिति
दस्तावेज िदखाते राजवीर
स्व. दुल्लीचंद फाइल फोटो