जिला पुस्तकालय में सुविधाओं का अभाव
ज्ञानका खजाना यानि पुस्तकालय की तरफ प्रशासन सरकार का कोई ध्यान नहीं है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिला पुस्तकालय में रखी हजारों किताबों की धूल झाड़ने वाले से लेकर इनके रख रखाव के लिए यहां पर कर्मचारी ही नहीं हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि इन किताबों को पढ़कर ज्ञान बढ़ाने के लिए यहां हर रोज आने वाले सैकड़ों पाठकों के बैठने के लिए पर्याप्त संख्या में कुर्सियां भी नहीं हैं।
किताबों में जिज्ञासा रखने वाला व्यक्ति यहां पर सुबह-शाम आकर आराम से घंटे-दो घंटे किताबें पढ़ सकें इसके लिए पुस्तकालय में लाइट की भी कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। इस कारण यहां हर रोज आने वाले पाठकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दो लाख की आबादी वाले शहर के एकमात्र पुस्तकालय में पाठकों के बैठने के लिए पर्याप्त संख्या में कुर्सियां नहीं हैं। यहां पर सिर्फ 50 कुर्सियां हैं। इनमें से कुछ कुर्सियां टूटी हुई हैं।
सुबह के समय पुस्तकालय में अखबार पुस्तकें आदि पढ़ने के लिए अधिक लोग आते हैं। इस दौरान लोगों को बैठने के लिए कुर्सी ही नहीं मिलती। इधर-उधर कोनों में खड़े होकर अखबार किताबें पढ़नी पड़ती हैं। पुस्तकालय में इस समय 47 हजार 179 पुस्तकें हैं। अधिकतर पुस्तकें काफी पुरानी हैं। सरकारी बजट के अभाव में नई किताबें खरीदी ही नहीं जा रही। पुस्तकों के रखरखाव के लिए भी फिलहाल कोई बजट नहीं है।
जिला पुस्तकालय में जो सुविधाएं होनी चाहिए। ऐसी कोई भी सुविधा यहां पर नहीं है। इससे बड़ी और क्या दिक्कत हो सकती है कि यहां आने वाले पाठकों को बैठने के लिए कुर्सी ही नहीं मिलती। इसी तरह से यहां पर हिंदी रोजगार पत्र जैसे जरूरी समाचार पत्र भी पढ़ने को नहीं मिलते। -अजय, पांडुपिंडारा निवासी।
मैं हर रोज यहां पर पुस्तकें समाचार पत्र पढ़ने के लिए आती हूं। कई बार ऐसे हालात होते हैं कि पुस्तकालय में बैठने के लिए कुर्सी ही नहीं मिलती। इसके अलावा यहां पर लाइट भी नहीं जलती। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। -सीमाभारती, पटियालाचौक।
जींद. राजकीयजिला पुस्तकालय में किताब और अखबार पढ़ते युवा।
जिला पुस्तकालय में काफी दिनों से कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं। बजट के अभाव में कुर्सियां, लाइट की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। इस बारे में पत्र भी लिखा गया है, लेकिन अभी बजट होने का जवाब मिलता है। -मोहनलाल कौशिक, रेस्टोररजिला पु