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मैया तुम कातिल ना बनना, मेरी नन्हीं सी जान की...

7 वर्ष पहले
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मैयातुम कातिल ना बनना, मेरी नन्हीं सी जान की। मैं तिनके चुगती चिड़िया हूं, बाबुल के रोशनदान की। कुछ दिन रैन बसेरा है, फिर दूर देश उड़ जाना है, यह अंतिम विनती सुन लेना, इस अनचाहे मेहमान की...आदि पंक्तियों के माध्यम से कन्या भ्रूण हत्या कराने का संदेश दिया है।

अवसर था हिंदी प्रेरक संस्था द्वारा बाल भवन में आयोजित काव्य एवं विचार गोष्ठी का। हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत की गई गोष्ठी में अनेक साहित्यकारों साहित्य प्रेमियों ने भाग लिया। इसमें हिंदी की वर्तमान स्थिति कन्या भ्रूण हत्या आदि कई विषयों पर वक्ताओं ने व्याख्यान दिया।

हिंदीको बनाए व्यवहार की भाषा: संस्थाअध्यक्ष एवं प्रसिद्ध साहित्यकार रामफल सिंह खटकड़ ने कहा कि अनेक बाधाओं के बावजूद हिंदी अपने विकास के पथ पर अग्रसर है।

इसे अंतरराष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए व्यवहार की भाषा बनाया जाना आवश्यक है। पर विडंबना यह है कि भारतीय जनमानस का विदेशी भाषा के प्रति अवांछित मोह बढ़ रहा है जो हिंदी के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। संस्था महासचिव नरेंद्र अत्री ने कहा कि हिंदी की वर्तमान स्थिति निराशाजनक नहीं है।

आज संचार के अनेक माध्यमों द्वारा हिंदी निश्चित रूप से फल फूल रही है। हिंदी विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। बस जरूरत है इसे विश्व पटल पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की।

भ्रूण हत्या समाज के लिए कलंक

भिवानीसे आए प्रसिद्ध गीतकार विकास यशकीर्ति ने सामाजिक बुराई कन्या भ्रूण हत्या को समाज के लिए कलंक बताया और कटाक्ष करते हुए एक कन्या के मन के विचारों को एक गीत के माध्यम से व्यक्त किया। राजेंद्र मानव ने सामाजिक विसंगतियों के उपजे मनोभावों को \\\"कैसे हालात रहे होंगे, जख्मी जज्बात रहे होंगे\\\'...। मंगतराम शास्त्री ने दूसरों के काम आता है पेड़, उम्रभर खुशियां लुटाता है पेड़ आदि पंक्तियों के जरिए पेड़ों के महत्व उनका मानव जीवन में उपयोग बारे अवगत कराया। साहित्यकार ओमप्रकाश चौहान ने मातृभाषा हिंदी की प्रशंसा करते हुए हिंदी हिंद की शान है, हिंदी हिंद का मान है आदि पंक्तियां व्यक्त की। काव्य गोष्ठी का संचालन गीतकार नरेंद्र अत्री ने किया। गोष्ठी कार्यक्रम में समाजसेवी डीसी विकास नेशनल अवार्डी सुभाष ढिगाना ने हिंदी भाषा के अपनाने पर बल दिया।

जींद. बालभवन में अपनी कविता सुनाते कवि।