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खेलना शुरू किया तो ग्रामीण उड़ाते थे मजाक विकलांगता को मात दे बने अंतरराष्ट्रीय चैंपियन
15साल पहले गांगोली गांव का विकलांग युवक जगमहेंद्र उर्फ जग्गा खेलने के लिए जब मैदान में उतरा तो ग्रामीणों के लिए मजाक बन गया। किसी ने भी नहीं सोचा था कि विकलांग होने के बावजूद जग्गा एक दिन अंतरराष्ट्रीय चैंपियन बन जाएगा।
जग्गा ने ग्रामीणों के मजाक को गंभीरता से लिया और जिद कर चैंपियन बनने की ठान ली। हर रोज कड़ा अभ्यास कर उसने विकलांगता को भी मात दे दी। परिणाम यह है शॉटपुट (गोला फेंकने) में एशिया में जग्गा की दूसरी रैंकिंग है और उसके नाम 11.60 मीटर दूर गोला फेंकने का रिकाॅर्ड। जबकि डिस्कस थ्रो में उसके नाम 40.90 मीटर का रिकाॅर्ड है। जग्गा को वर्ष 2010 में नेशनल प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल करने पर प्रदेश सरकार ने उन्हें दो लाख रुपए की राशि देकर सम्मानित भी किया था।
32 वर्षीय जगमहेंद्र उर्फ जग्गा वर्ष 2010 से लेकर जिला स्तरीय, स्टेट, नेशनल प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहा है। वर्ष 2010 में उसने पंचकूला में हुए राष्ट्रीय पैरा ओलंपिक में शॉटपुट में गोल्ड मेडल हासिल किया। वर्ष 2012 में कुवैत में हुई ओपन एथलेटिक एशियन चैंपियनशिप में शॉटपुट डिस्कस दोनों में गोल्ड मेडल हासिल किया। वर्ष 2012-13 में बेंगलुरु में हुई नेशनल पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में डिस्कस थ्रो में गोल्ड जीता। वर्ष 2012 में मलेशिया में हुई पैरा एथलेटिक एशियन चैंपियनशिप में शॉटपुट में गोल्ड मेडल हासिल किया। वर्ष 2015 में गाजियाबाद में हुई नेशनल पैरा एथलेटिक चैंपियनशिप में डिस्कस थ्रो में गोल्ड मेडल जीता है। इसी तरह कई राज्य जिला स्तरीय प्रतियोगिता में भी जग्गा ने मेडल जीते हैं।
जगमहेंद्र उर्फ जग्गा बताते हैं कि जब मात्र नौ महीने के थे तब वह पोलियो की चपेट में गए। इसके कारण वह 50 प्रतिशत विकलांग हो गए। जब वह स्कूल में पढ़ रहे थे तो एक दिन जब स्कूली खेल हो रहे थे। वह भी गोला फेंकने के लिए मैदान में गए। उनके दुबले-पतले शरीर विकलांगता को देखकर विद्यार्थी और ग्रामीण उनका मजाक उड़ाने लगे। उसी दिन उन्हांेने ठान लिया था कि मैं भी इसके लिए कड़ा अभ्यास करूंगा और एक दिन इसमें मेडल जरूरी जीतूंगा।
} शॉटपुट में एशिया में ही दूसरी रैंकिंग, 11.60 मीटर का बनाया है रिकाॅर्ड
} जग्गा की सफलता के अब ग्रामीण भी हैं कायल, सरकार कर चुकी है पांच साल पहले सम्मानित