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सरपंच बोलीं, पांच साल में नहीं जा सकीं पंचायत में

6 वर्ष पहले
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पंचायत भवन में फीड बैक कार्यक्रम के दौरान महिला पंचों सरपंचों का दर्द छलका

हक की आवाज

पंचायतभवनमें फीड बैक कार्यक्रम के दौरान महिला पंचों सरपंचों का खूब दर्द छलका। महिला पंचों सरपंचों का कहना था कि खानापूर्ति करने के लिए पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण तो मिल जाता है। लेकिन उन्हें कभी पंचायतों में हिस्सा लेने नहीं दिया जाता। महिला पंच सरपंच अगर पंचायत में जाने की बात करती है तो उन्हें लोक लज्जा का डरावा दिखाया जाता है।

हरियाणा ग्रामीण विकास संस्थान नीलोखेड़ी की ओर से ग्रामीण क्षेत्र में पांच वर्षों के दौरान किए गए विकासात्मक कार्यों पेश आई दिक्कतों की फीड बैक लेने के लिए गांवों की पंचायतों को बुलाया गया था। कार्यक्रम के तहत फीड बैक ले रहे अधिकारी भी महिला पंच सरपंचों के दर्द को सुनकर हैरान रह गए। विभिन्न गांवों से पहुंची महिला पंच सरपंचों ने कहा कि पांच वर्षों में एक बार भी पंचायत की बैठक में हिस्सा नहीं लिया।

उन्हें जिस कार्य की गांव वासियों ने जिम्मेदारी सौंपी होती है, वे उसे करने में असमर्थ हैं। ज्यादातर महिला पंच सरपंचों को गांव में हो रहे विकासात्मक कार्यों के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है। अधिकारी सुशील कुमार सुनीता ने कहा कि देश में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए शहर से गांवों तक अनेक योजनाएं लागू कर रखी हैं। इनमें से कुछ ऐसी योजनाएं भी हैं जिनमें महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य है। अगर चुनी गई पंच और सरपंच अनदेखी का शिकार हो रही हैं तो यह गंभीर विषय है। महिलाएं अपनी शिकायतें पंचायतों में ले जाने से कतराएंगी। महिलाओं की समस्याओं के साथ-साथ अत्याचार भी बढ़ेंगे।

बोलने का हक नहीं

^हमबहुमत से जीतकर पंचायत में पहुंचती है। महिलाओं को उम्मीद होती है सरपंच पंच उनके हकों की बात करेंगी, लेकिन पंचायत में बोलने ही नहीं दिया जाता। गांव में छह महिला पंच हैं। उन्हें पंचायत में जाने का अधिकार नहीं है। महिलाओं के पति ही उनके स्थान पर हिस्सा लेते हैं। महिला सशक्तिकरण जैसी योजनाएं शहरों तक ही सीमित रह गई हैं। श्यामोदेवी, पंच धौंस

घूंघट खोलने की मनाही

^पंचायतमें जाना तो दूर घूंघट खोलने की भी मनाही है। अगर गांव में कोई महिला घूंघट खोलती है तो लोग उसे ताने देने लगते हैं। कहते हैं इसे लोक लज्जा नहीं है। पंचायत में अगर कोई महिला इंसाफ के लिए जाती है तो उसे बोलने का अधिकार नहीं होता। मर्द उसे अपनी बात रखने का भी मौका नहीं देते और फैसला सुना देते हैं। नन्नीदेवी, पंच धुंधरेहड़ी

सरपंच तो हूं, पंचायत में नहीं गई

^गांवकी सरपंच बने पांच वर्ष हो गए हैं। इन पांच वर्षों में एक बार भी पंचायत में नहीं गई। जब अधिकारी पंचायत को ट्रेनिंग या किसी कार्यक्रम के लिए बुलाते हैं तो ही मर्द प्रधान समाज को महिला पंच सरपंचों की याद आती है। अन्यथा गांव की पंचायतों में उन्हें हिस्सा लेने के लिए कभी नहीं बुलाया जाता। पंचायत के फैसलों पर घरों में ही महिला पंच सरपंचों से अंगूठा या हस्ताक्षर कराकर काम चला लिया जाता है। कर्मजीतदेवी, सरपंच धौंस