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जिस घर में सास-बहु इकट्‌ठी पड़े बीमार रहती उस घर शांति, होवे तकरार...

6 वर्ष पहले
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आरकेएसडीकॉलेजके प्रांगण में रविवार को मासिक साहित्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. एएल मदान संचालन सचिव ईश्वर चंद गर्ग ने किया। गोष्ठी को हरियाणा के लोककवि हरिकेश पटवारी को उनको जयंती पर समर्पित किया गया।

डॉ. चतरभुज बंसल ने कहा, जूत, ऊत, भूत पूत तै तीनों हैं उपकारी। सुखी पूत बिना, ऊत पूत के होने में दुख भारीज्। रिसाल जांगड़ा ने कहा, पडय़ा मेरे तै काम नहीं सै, उसनै करया सलाम नहीं सै। इस कलयुग की रामायण मैं, रावण तो सै, राम नहीं सैज। चेतन चौहान ने कहा, उम्मीदों के रोशन मेहताब रखाकर। जिंदा रहने के लिए कुछ ख्वाब रखाकर। महके तेरी खुशबू से, कोई भी मिले तुझसे। बातें इस कदर अपनी गुलाब रखाकर। डॉ. चतरभुज बंसल ने कहा, आपणी जाण मैं तो हर माणस लावै जोर बतेरा। कौन करवट ऊंट बैठ जा, नहीं किसी नै बेरा। दिनेश बंसल ने कहा, च्कहानियों में हकीकत नहीं हुआ करती। बिना फरेब सियासत नहीं हुआ करतीज्। डॉ. तेजिंद्र ने कहा, च्जिस घर में सास-बहु इकट्ठी पड़े बीमार। रहती उस घर शांति, होवे तकरारज्। कमलेश शर्मा ने कहा, च्आंख मेरी हुई हैं नम अकसर, कोई बिछड़ा जो याद आता है। आज सूरज नया-नया सा है, शायद वो घर को आता हैज्। ऊषा गर्ग ने कहा, च्तूने आंगन नहीं बुहारा, कैसे आएंगे भगवान। तेरा गंदा पड़ा द्वारा, कैसे आएंगे भगवान। प्रो. एएल मदान ने कहा, बोलते कैसे बोली आंसू। बिन बारात ज्यूं डोली आंसू। ढह जाएंगे, बह जाएंगे। नहीं फैलाते झोली आंसू। कार्यक्रम में रविंद्र रवि, सरोज जोशी, टीसी अग्रवाल, श्याम सुंदर शर्मा, डॉ. ओपी बंसल, रामफल गौड़, अनिल गर्ग, विजय कृष्ण राठी, अशोक अत्री और दिलबाग सिंह मौजूद थे।