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- परदेसां म्हं रहण लागगे, करण कमाई जावैं सै, बेटा बिछड़या मां बाप तै, पाछै तै पछतावै सै
परदेसां म्हं रहण लागगे, करण कमाई जावैं सै, बेटा बिछड़या मां-बाप तै, पाछै तै पछतावै सै
साहित्यसभाकी मासिक समीक्षा गोष्ठी आरकेएसडी कॉलेज में हरीश झंडई की अध्यक्षता में हुई। संचालन अशोक अत्रे ने किया। गोष्ठी का आगाज विकास भारतीय ने गजल गाकर किया- मेरे दिल में है तूफान हमारा क्या होगा, प्यारे हिंदुस्तान तुम्हारा क्या होगा।
गजल में अपनी विडंबना को चेतन चौहान ने यूं बयां किया- राह में मुझको उसी ने लूटा है,जिसने कहा था जाना सावधानी से। शक्ति अग्रवाल ने प्रजातंत्र पर व्यंग्य करते हुए हुए कहा- प्रजातंत्र में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। विदेशों में कमाई के लिए युवाओं के मोह को सतबीर जागलान ने यूं बयां किया- परदेसां म्हं रहण लागगे, करण कमाई जावैं सै, बेटा बिछडय़ा मां-बाप तै, पाछै तै पछतावै सै। अशोक अत्रे ने मिजारम के अपने यात्रा संस्मरण को कविता के माध्यम से सुनाया- आइजोल-आइजोल, प्रकृति का सुंदर, भोर सुबह की खिड़की खोल, पांच बजे सूरज रहा बोल। सीता राम गुलाटी ने कहा- क्या कभी आपने सोचा है कि पति और चाय की पत्ती में क्या समानता है- दोनों की किस्मत में जलना और उबलना लिखा है , कभी-कभी मैं कैदी सा और जग लगे एक जेल सा। रविंद्र कुमार रवि ने अंदाज-ए बयां देखिए-अब तो हमारे शहर का नक्शा बदल गया, हर आदमी की सोच का रास्ता बदल गया। राजेश जोशी ने मन रूपी पंछी की व्यथा को यू बयां किया- क्षत विक्षत है मन पंछी, कटे पंख कैसे उड़ सकता।