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परदेसां म्हं रहण लागगे, करण कमाई जावैं सै, बेटा बिछड़या मां-बाप तै, पाछै तै पछतावै सै

7 वर्ष पहले
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साहित्यसभाकी मासिक समीक्षा गोष्ठी आरकेएसडी कॉलेज में हरीश झंडई की अध्यक्षता में हुई। संचालन अशोक अत्रे ने किया। गोष्ठी का आगाज विकास भारतीय ने गजल गाकर किया- मेरे दिल में है तूफान हमारा क्या होगा, प्यारे हिंदुस्तान तुम्हारा क्या होगा।

गजल में अपनी विडंबना को चेतन चौहान ने यूं बयां किया- राह में मुझको उसी ने लूटा है,जिसने कहा था जाना सावधानी से। शक्ति अग्रवाल ने प्रजातंत्र पर व्यंग्य करते हुए हुए कहा- प्रजातंत्र में बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। विदेशों में कमाई के लिए युवाओं के मोह को सतबीर जागलान ने यूं बयां किया- परदेसां म्हं रहण लागगे, करण कमाई जावैं सै, बेटा बिछडय़ा मां-बाप तै, पाछै तै पछतावै सै। अशोक अत्रे ने मिजारम के अपने यात्रा संस्मरण को कविता के माध्यम से सुनाया- आइजोल-आइजोल, प्रकृति का सुंदर, भोर सुबह की खिड़की खोल, पांच बजे सूरज रहा बोल। सीता राम गुलाटी ने कहा- क्या कभी आपने सोचा है कि पति और चाय की पत्ती में क्या समानता है- दोनों की किस्मत में जलना और उबलना लिखा है , कभी-कभी मैं कैदी सा और जग लगे एक जेल सा। रविंद्र कुमार रवि ने अंदाज-ए बयां देखिए-अब तो हमारे शहर का नक्शा बदल गया, हर आदमी की सोच का रास्ता बदल गया। राजेश जोशी ने मन रूपी पंछी की व्यथा को यू बयां किया- क्षत विक्षत है मन पंछी, कटे पंख कैसे उड़ सकता।