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- यहां हारकर भी जीते और जीतकर भी हारे प्रत्याशी
यहां हारकर भी जीते और जीतकर भी हारे प्रत्याशी
कहावतहै कि समय से पहले और भाग्य से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता, यह कहावत शायद तब रोहट अब खरखौदा हलके पर वर्ष 1991 में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों पर खरी उतरती है।
सुनने में बेशक अचरज लगे, लेकिन ये बात सच है कि खरखौदा में वर्ष 1991 में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी हुक्म सिंह दहिया हारकर भी जीते और केवल पांच वर्ष विधायक बने बल्कि समाज कल्याण विभाग में मंत्री भी रहे। इसी चुनाव में 38 मतों के अंतराल से हारे जनता पार्टी के महेंद्र सिंह चुनाव जीतकर भी हार गए। महेंद्र सिंह इस चुनाव के विजेता थे, लेकिन गिनती में हुई गड़बड़ी के कारण वे उस समय विजेता घोषित हुए जब उनकी जीत के कोई मायने नहीं रहे।
जैसे ही वर्ष 1991 में मतों की गिनती हुई तो हुक्म सिंह दहिया को 38 मतों के अंतराल से विजेता घोषित किया गया। लेकिन गिनती में अनियमितता को लेकर महेंद्र सिंह मामले को न्यायालय में ले गए। इस दौरान कांग्रेस पार्टी सत्तासीन रही और हुक्म सिंह को सरकार ने समाज कल्याण विभाग में मंत्री का दर्जा दिया। पूरे पांच वर्ष मंत्री रहने के बाद न्यायालय ने जांच के बाद फैसला सुनाया कि वर्ष 1991 के चुनाव में हुक्म सिंह नहीं बल्कि महेंद्र सिंह जीते थे लेकिन जिस समय न्यायालय का फैसला आया उस समय तक पांच वर्ष सत्ता सुख स्वर्गीय हुक्म सिंह दहिया ले चुके थे। इस चुनाव में नवल सिंह दहिया हरियाणा विकास पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़कर तीसरे स्थान पर रहे थे।
मतगणना केंद्र में गिनती के बाद परिणाम के रूप में हुकम सिंह को 38 मतों से विजेता घोषित किया गया, जबकि दूसरे नंबर पर रहे जनता पार्टी के महेंद्र सिंह ने दावा किया था कि बेल्ट पेपर गिनती में गड़बड़ी हुई है। यह मामला न्यायालय पहुंचा और पांच वर्ष बाद न्यायालय ने हुकम सिंह की बजाय महेंद्र सिंह को विजेता घोषित किया। इस पर महेंद्र सिंह जीत तो गए लेकिन तब तक विधान सभा का कार्यकाल पूरा हो गया।