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आपदा से कड़े फैसले ही बचाएंगे

7 वर्ष पहले
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जम्मू कश्मीरकी आपदा को एक लेख के दायरे में समेटना किसी त्रासदी से कम नहीं है। माहौल में भावनाएं हावी हैं और तर्कपूर्ण ढंग से सोचना कठिन है। हमने पहले भी प्राकृतिक आपदाएं देखी हैं। वे हमारे लिए नई नहीं हंै, लेकिन इस बार जम्मू-कश्मीर में जो हुआ उसकी भूतकाल में कोई मिसाल नहीं मिलती। 10 लाख की आबादी वाली राजधानी का पानी में डूबना कोई सामान्य घटना नहीं है। फिर जब इसमें मकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, आधारभूत ढांचे का थोक में विनाश और बड़े पैमाने पर महामारी फैलने का खतरा हो तो लोगों में गुस्सा और हताशा पनपना स्वाभाविक है।

इस समय राहत और प्रशासन को दिशा देने में राज्य सरकार की अक्षमता के कारण गुस्सा और बढ़ गया है। यह तो हमेशा तैयार रहने वाली भारतीय सेना है, जो लोगों को उनकी दुश्वारियों से बाहर निकालने के प्रयासों में जुटी है। विडंबना है कि यह वही सेना है, जिस पर पृथकतावादियों और सीमा पार के उनके आकाओं के भड़काने पर तरह-तरह के लांछन लगाए गए थे। हालांकि, देशभर में सहानुभूति बढ़ने और मीिडया द्वारा कश्मीर की दिल छू लेने वाली हकीकत को पेश करने के साथ सही सोच वाले लोगों को अहसास हुआ कि यह त्रासदी छोटी बातों, राजनीति या विभाजनकारी रवैये का वक्त नहीं है। वक्त राष्ट्र की एकजुटता, एकता और परिपक्वता दिखाने का है। ठीक यही इस खौफनाक त्रासदी के दौर में हो भी रहा है।

क्या जम्मू-कश्मीर ऐसे विध्वंस के लिए तैयार था? जहां यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप लगाने का नहीं है, वहीं भविष्य में आपदा-प्रबंधन संबंधी बहस के लिए जानकारी से लैस रहना हमारे लिए बेहतर होगा। जो जम्मू-कश्मीर को अच्छी तरह जानते हैं, उन्हें मालूम है कि यह पूरा क्षेत्र इकोलॉजी के हिसाब से आपदा की परीक्षा-भूमि है। असलियत यह है कि जो सतह पर दिखता है और साल-दर-साल जो साफ होता जाता है, उसकी ओर ही ध्यान जाता है। ध्यान में रखना होगा कि जम्मू क्षेत्र के निचले इलाके के पीर पंजाल और किश्तवाड़ रैंज में कई नदियां नाले हैं, जिनमें बाढ़ आती रहती है। जहां तक जम्मू और इसके उपनगरों का सवाल है, इन नदियों की बाढ़ के प्रभाव को बेअसर करने की योजनाएं एेतिहासिक रूप से उपलब्ध आकड़ों पर आधारित हैं और उन्हें हर साल अच्छी तरह अमल में लाया जाता है। इसी प्रकार लद्दाख में बादल फटने की घटनाएं आम हैं और प्रशासन सेना ने इनसे निपटने की व्यवस्थित योजनाएं बना रखी हैं। हाल