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नरमे के गिरे भावों से किसान मायूस तो सीसीआई हो रही मालामाल

6 वर्ष पहले
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इसबार नरमे के बाजार भावों में गिरावट होने के चलते एक ओर जहां किसानों को नुकसान हुआ, वहीं इसका फायदा सीसीआई (कॉटन कार्पोरेशन इंडिया लिमिटेड) की खरीद में देखने को मिला है। सीसीआई की पिछले वर्ष नरमे की कुल खरीद 60 हजार क्विंटल से बढ़कर 3 लाख 58 हजार तक पहुंच गई है। खरीद में दर्ज इस बढ़ोत्तरी को लेकर जहां सरकार उत्साहित है मगर किसानों की मायूसी को झुठलाना उचित नहीं होगा

दरअसल जिले के साथ लगते अन्य तीन जिले जिनमें फतेहाबाद, जींद हिसार शामिल है बढ़ी संख्या में नरमे की खेती होती है। चारों जिलों के किसानों को इस बार मजबूरन सरकारी एजेंसियों को ही अपनी फसल बेचनी पड़ी है। इस वर्ष साढ़े 27 एमएम रेशे का 3950 रुपये था साढ़े 26 एमएम रेशे का 3900 रुपये था। पिछले वर्ष 2013 से 14 का सरकारी रेट 3850 रुपये 3900 रुपये था। इस बार सरकारी रेट में बढ़ोतरी हुई मगर मार्केट रेट में भारी गिरावट दर्ज हुई। जिससे किसानों को नरमा सरकारी दामों पर बेचना पड़ा।

निर्धारित सरकारी दाम है फायदेमंद

सरकारद्वारा नरमे का रेट निर्धारित करने से किसानों को काफी फायदा होता है। सीसीआई के अधिकारियों मुताबिक व्यापारी सरकारी रेट से कम में नरमा नहीं खरीद सकते। जिससे किसानों को नरमे के भाव में सरकारी रेट से ज्यादा गिरावट का सामना नहीं करना पड़ता। किसानों के पास अपनी फसल बेचने अधिकार होता है जिसके तहत व्यापारी उसे सरकारी रेट से ज्यादा दाम देता है तो वह बेच सकता है।

सीसीआई द्वारा सरकारी रेट पर ही खरीदा जाता है

सीसीआईमें सिरसा में ब्रांच मैनेजर एसपी महेशी ने बताया कि सरकार द्वारा निर्धारित किए गए रेटों पर ही किसानों से नरमा खरीदा जाता है। ये रेट हरियाणा, पंजाब कुछ राजस्थान के हिस्सों में भी एक जैसे ही रहते हैं। सरकार द्वारा नरमे का भाव निर्धारित किए जाने पर अगर किसान को उससे ज्यादा बाजार भाव मिलता है तो वह फसल को कहीं भी बेच सकता है। इस बार मार्केट दाम कम होने से किसानों ने सीसीआई को नरमा ज्यादा बेचा है। नरमे का बाजार भाव इस बार कम रहा।