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नोटा बिगाड़ सकता है नेताओं का चुनावी गणित

7 वर्ष पहले
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लोकसभाचुनाव के बाद अब विधानसभा चुनाव में भी नोटा (नन ऑफ दी अबव) गया है। प्रदेश के चुनावी इतिहास में यह पहला अवसर होगा जब मतदाताओं को नोटा के रूप में भी एक बटन दबाने का अधिकार होगा।

लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का यह अधिकार कहीं अधिक महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि बीते विधानसभा चुनाव में सोनीपत सहित विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में बेहद करीबी अंतर से उम्मीदवारों की हार-जीत का फैसला हुआ था। विशेष रूप से यहां उन क्षेत्र में और अधिक रंग दिखाएगा यह नोटा जहां टिकटों को लेकर बगावत हुई है और जनता के पसंद के उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया गया वहां पर वोटर नोटा का इस्तेमाल सबसे अधिक हो सकता है।

येआंकड़े बताते हैं वोट का महत्व : प्रदेशमें विधानसभा चुनाव के दौरान ऐसी बहुत सी सीटें हैं जिनमें हार-जीत का अंतर बेहद कम मार्जन का होता है। 2009 के विधानसभा चुनाव में दादरी में हुई कांटे की टक्कर में हजकां के सतपाल ने इनेलो के रणदीप को 145 मतों से मात दी थी। इसी तरह उचाना कलां में ओमप्रकाश चौटाला ने बिरेंद्र सिंह को 621, लोहारू में धर्मपाल ने जयप्रकाश को 623, तिगांव से बीजेपी के कृष्णपाल ने कांग्रेस के ललित नागर को 818 मतों से हराया था। सोनीपत में भाजपा की कविता जैन ने कांग्रेस के अनिल ठक्कर को 2657 मत से हराया था। वहीं घरौंडा में हार-जीत का अंतर 1660, इसराना में 2180, शाहाबाद में 2505 रहा था। ऐसे में इस बार ऐसी कांटे की टक्कर वाली हॉट सीटों पर यदि नोटा का प्रयोग हो गया तो पासा एकदम पलटना तय है।

कहां कितना दबा नोटा पर बटन

अम्बाला 7819

रोहतक 4932

सिरसा 4033

फरीदाबाद 3334

करनाल 2929

गुड़गांव 2657

कुरुक्षेत्र 2482

सोनीपत 2403

भिवानी 1994

हिसार 1645

लोकसभा चुनावों में प्रदेश की 10 सीटों पर 34 हजार से अधिक वोटर्स ने नोटा का प्रयोग किया था। मतलब एकदम साफ इन मतदाताओं को लोकसभा की 10 सीटों पर खड़े उम्मीदवारों में से कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं था।