डिपो की कंडम बसों को बनाया जा रहा कबाड़
सोनीपतडिपो की नौ कंडम बसों को कबाड़ बनाया जा रहा है। ये बसें छह महीने पहले ही कंडम घोषित की जा चुकी हैं, लेकिन आज तक इनकी नीलामी की अनुमति मुख्यालय से नहीं मिल सकी। हरियाणा रोडवेज के नियमानुसार आठ साल या सात लाख किलोमीटर चल चुकी बसों को वर्कशाप में खड़ा कर दिया जाता है। जिसकी घोषणा कंडम बसों में कर दी जाती हैं, लेकिन यह बसें भी अगर तय समय से नीलाम कर दी जाएं तो कम से कम एक बस चार से छह लाख रुपए तक बिकती हैं, लेकिन रोडवेज प्रबंधन के लचीलेपन और अनदेखी के कारण यह बसें कबाड़ में तब्दील होती जा रही हैं।
सोनीपत डिपो 220 बसों का बेड़ा है। जिसके माध्यम से करीब दो दर्जन रूटों पर यह बसें सवारियों को पहुंचाती छोड़ती हैं। बसें कंडम होती रहती है और नई आती रहती है। बसों का कंडम होने का चक्र हैं। डिपो कर्मचारियों के मुताबिक फरवरी महीने में दो बसें और जून में छह बसें कंडम हुई थी। जिसके बाद उन्हें डिपो में ही खड़ा कर दिया गया, लेकिन तीन महीने तक कोई नई बस नहीं आई। जिसके कारण कई रूटों पर परेशानी भी उठानी पड़ी थी। अगस्त में परिवहन निदेशालय ने इन बसों की क्षतिपूर्ति कर दी। वहीं जिस बस के किसी पार्ट खराबी जाती है, तो कंडक्टर और ड्राइवर इन बसों से निकालकर ले जाते हैं।
^परिवहन निदेशालय को कंडम बसों की स्थिति से अवगत करा दिया गया है। सारी बसें एक्सीडेंटल है और मामला कोर्ट में चल रहा है जैसे ही कोर्ट से आदेश मिलेगा तो बसों को नीलाम कर दिया जाएगा।\\\'\\\'जयपाल राणा,महाप्रबंधकसोनीपत डिपो।
डिपो के वरिष्ठ अधिकारियों की मानें तो इस समय एक बस कीमत करीब 40 लाख रुपए हैं। सरकार द्वारा बनाई गई पॉलिसी के तहत इन बसों को सात साल में ही रिटायर कर दिया जाता है, लेकिन ये बसें देखने में इतनी खराब नहीं लगती है। बड़ी संख्या में बसें ऐसी होती हैं, जो सड़कों पर फर्राटा भरने के काबिल होती है। अगर ऐसा नहीं है तो भी अगर समय से इनकी नीलामी कर दी जाती है, तो इन नौ बसों से कम से कम सरकार को 45 से 50 लाख रुपए मिल सकता है, लेकिन जिस तरह से सड़ रही हैं, यह तो किलो के भाव में भी कम पड़ जाएंगी। यूनियन नेता जगमोहन आंतिल ने कहा कि सरकार और रोडवेज प्रबंधन को बचत और पैसे कमाने के संभावित केंद्रों की ओर ध्यान देना चाहिए। ताकि सरकार को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।
सोनीपत. सोनीपतबस अड्डे में खड़ी कंडम बसे।