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अब हिंदी नहीं, मनेगा भारतीय भाषा दिवस

7 वर्ष पहले
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हिंदीहमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है, हिंदी हमारी परंपरा है, इसमें कोई संशय नहीं है। लेकिन हिंदी को अब राजनैतिक मुद्दा बनने नहीं दिया जाएगा। यही कारण कि भविष्य में 14 सितंबर को साहित्य परिषद हिंदी दिवस नहीं बल्कि भारतीय भाषा दिवस मनाया जाएगा। हरियाणा प्रदेश अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष एवं साहित्य चिंतक एवं भाषाविद डॉ. नंदलाल मेहता वागीश की इस बात को तब और बल मिला जब अन्य साहित्यकारों ने भी इसका समर्थन किया।

यहां गेटवे शिक्षण संस्था परिसर में हिंदी सप्ताह के उपलक्ष्य में आयोजित विचार गोष्ठी में राष्ट्र भाषा हिंदी की मौजूदा स्थिति पर गंभीरता पूर्वक चिंतन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता वागीश ने कहा कि हिंदी महज एक भाषा नहीं बल्कि अपनी संवेदना व्यक्त करने का भी एक मजबूत माध्यम है, लेकिन कुछ लोग हिंदी को राष्ट्र भाषा मानने को तैयार नहीं और इसका विरोध करते हुए विवि में पढ़ाने पर भी रोक के रूप राजनीति भी करते हैं।

इसी को ध्यान में रखते विचार है कि भविष्य में हम हिंदी दिवस नहीं बल्कि भारतीय भाषा मनाएंगे और उसमें हिंदी पर चर्चा करेंगे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. संतराम देशवाल ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा कि हिंदी का विश्व भाषा के रूप में डंका बज चुका है तथा अपने वेग में अब यह सभी बाधाएं दूर करती हुई आगे निकल जाएगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए परिषद के संरक्षक मनोहर लाल अग्रवाल ने कहा कि इस प्रकार के आयोजन से भाषा को लेकर भ्रांतियां दूर होती है।

परिषद के मार्गदर्शक डॉ. शिव कुमार खंडेलवाल ने बताया कि बेशक पश्चिमी संस्कृति के इस दौर में हिंदी के मार्ग में अनेक अड़चन है, लेकिन इसे मृत भाषा मान इसका श्राद्ध नहीं बल्कि इसके महत्व को समझते हुए आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। इस मौके पर साहित्यकार डॉ. ओमीश परूथी ने बताया कि हिंदी को लेकर अपना वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखा तो एमडीयू के प्रो. रामसजन पांडेय ने हिंदी को लेकर अपनी लोगों की मानसिकता बदलने की बात कही।

कार्यक्रम में डॉ. अशोक बत्रा रमेंश चंद्र शर्मा, केडी वशिष्ठ, डॉ. बीके सिंह, रमेश विकास, हरेंद्र कुमार यादव, महेंद्र कुमार, देशराज कैफ, जितेंद्र वशिष्ट, रामधन शर्मा, राधेश्याम शुल्क सहित अन्य कवियों ने अपनी प्रमुख काव्य रचनाएं प्रस्तुत की।

सोनीपत. प्रदेशस्तरीय विचार गोष्टी में विचार रखते हुए अेापी परुथी।