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दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से हनुमान गेट जगाधरी में साप्ताहिक सत्संग

7 वर्ष पहले
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आत्मा के कल्याण के लिए सतगुरु की पहचान जरूरी : आेबराय

यमुनानगर|जिसतरहशरीर की बीमारी दूर करने के लिए डाॅक्टर की जरूरत होती है, उसी तरह आत्मा के कल्याण के लिए पूर्ण सतगुरु की पहचान जरूरी है। पूर्ण सतगुरु इंसान को परमात्मा के दर्शन कराकर मोक्ष का मार्ग दिखा सकते हैं। यह शब्द महात्मा इकबाल चंद ओबराय ने रविवार को संत निरंकारी सत्संग भवन में आयोजित सत्संग के दौरान कहें। उन्होंने कहा कि धरती पर जन्म लेकर इंसान के मन में जाति-पाति धर्म, रंग भेद, नस्ल आदि की दीवारें बना दी जाती है। जन्म लेने से पहले इंसान का कोई धर्म, जाति नहीं होती। वह केवल इंसान होता है। लेकिन जन्म लेने के बाद उसकी धर्म और जाति बना दी जाती है। आज इंसान इस तन को कोड़ियों के भाव गवां रहा है। जिस काम के लिए इंसान दुनिया में आया है वह भूल गया है। इंसानी शरीर में रहकर ही इस आत्मा को पूर्ण परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं।

यमुनानगर| सत्संग में उपस्थित श्रद्धालु।

मनुष्य के कर्म मोतियों की माला के समान हैं: भारती

भास्कर न्यूज | यमुनानगर

दिव्यज्योतिजाग्रति संस्थान की ओर से हनुमान गेट जगाधरी में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में साध्वी सत्या भारती और भावना भारती ने प्रवचन किए। उन्होंने कहा कि जैसे एक माला के अंदर जुड़े हुए सुंदर मोती माला की शोभा है। ठीक उसी प्रकार परमात्मा ने बहुत सुंदर मोती एकत्र करके मानव जीवन के लिए श्रेष्ठ माला का निर्माण किया। 10 माला के मोती हैं कर्मशीलता, कुशाग्र बुद्धि। परंतु विडंबना ये है कि संसार की उधेड़बुन में माया आकर्षणों की रस्साकशी में ये माला टूट जाती है। मोती बिखर जाते हैं। इन मोतियों से मानव का उत्तम श्रृंगार हो सकता था, लेकिन सबकुछ एक दम विपरीत हो रहा है। कर्मशीलता रूपी मोती की बात करें तो कम की गीत विपरीत दिशा में हो गई है। मानव सांसारिक नकारात्मक कर्मों में फंसता जा रहा है। दूसरे मोती कुशाग्र बुद्धि की बात करें तो

ये मिला था मूलत: परमात्मा को जानने के लिए। बंधन मुक्त जीवन को प्राप्त करने के लिए। विडंबना यह है कि मनुष्य ने अपनी इस बुद्धि को केवल संसार को तराशने उसके विकास में लगाया। जीवन के मूल उद्देश्य से सदा भटका रहा। मनुष्य होते हुए भी पशुता की निम्न श्रेणी में गिरा। यदि हम फिर से इस सुंदर माला का निर्माण करना चाहते हैं तो इसके लिए हमें एक विवेकी सतपुरुष के मार्ग दर्शन