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हम मन से स्वस्थ हैं तभी करते हैं समाज को सुंदर
रामकथावाचक अयोध्या से आये आचार्य अजय महाराज ने कहा है कि यदि मन से स्वस्थ है तो हम अपने कार्य से जगत कल्याण और समाज को सुंदर बनाने का प्रयास करते हैं। मानसिक विकृति इतनी भयानक होती है कि एक बसे बसाये संसार को उजाडने और मिटाने में सफल होकर प्रसन्नत का अनुभव करती है। त्रेता युग की मंथरा समाज की उस विचार धारा को जन्म देती है, जो कभी सुखी रहकर किसी को सुखी नहीं रहने देने का था।
श्री सनातन धर्म सभा के तत्वाधान में पार्क गली बागेश्वर मन्दिर में शनिवार रात केकैयी-मंथरा प्रसंग की विस्तृत व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि मंथरा तन की टेढी नहीं थी, वो तो मन की भी टेढी थी। शरीर की बजाय मन का टेढा होना बडा ही भयावह होता है। शरीर से टेढे व्यक्ति तो कहीं-कहीं ही उपहास का पात्र बनते है, लेकिन मानसिक विकृति इतनी भयानक होती है कि एक बसे बसाये संसार को उजाडने और मिटाने में सफल होकर प्रसन्नता का अनुभव करती है। उन्होंने कहा यदि आप मन से स्वस्थ है तो अपने कार्य से जगत कल्याण और समाज को सुंदर बनाने का प्रयास करते है।
आचार्य अजय ने कहा राम जी के साथ सीता लक्ष्मण ही नहीं, यहां तक कि सारा अवध समाज राम जी के साथ अयोध्या छोडकर चल पडा। लोग कहते है कि जहां राम नही वहां काम नहीं। क्या जरूरत है अधंकार में रहने की, जिसमे कलुषित विचार होंगे वो शासक वन कर प्रजा को सुख और शान्ति नहीं दे सकता। शायद भरत जैसे धर्म धुरंर्धर को उनकी मां कैकेयी की करनी से लोग ये कहने पर मजबूर है कि जैसी मां होगी वैसे पुत्र भी तो होगा। उन्होंने कहा कि आज सता प्राप्त करने के लिए नाना प्रकार का हथकंडे लोग अपनाते है लेकिन जब तक सत्य और सत्ता, दोंनो में महाद्वंद रहेगा, तक राम राज्य नही सकता है।
नारनेोल . बागेश्वरधाम मन्दिर में सत्संग संगीतमय कथा सुनते श्रद्वालु