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महिला की डिलीवरी से पहले होगी थैलेसीमिया की जांच

5 वर्ष पहले
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गर्भवतीमहिलाओं और बच्चे की सुरक्षा के लिए सरकार ने सभी अस्पताल प्रमुखों को निर्देश दिए हैं कि अब अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं का डिलीवरी से पहले थैलेसीमिया का टेस्ट अनिवार्य कर दिया गया है। ताकि थैलेसीमिया से पीड़ित महिला के बच्चे को इससे बचाया जा सके। विभाग इसके लिए लैब टैक्निशियन को एक दिन की ट्रेनिंग भी देगा। यह योजना इसी माह से शुरू होगी।

अब एड्स के बाद थैलेसीमिया जैसी गंभीर बीमारी के प्रति भी स्वास्थ्य विभाग सजग दिख रहा है। गर्भवती महिलाओं के एड्स टेस्ट के बाद अब डिलीवरी से पहले थेलीसिमिया की जांच भी होगी। स्वास्थ्य विभाग ने इसका नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार थैलेसीमिया से पीड़ित माता-पिता से यह बीमारी नवजात में भी सकती है। इसकी आशंका बनी रह रहती है। अगर डिलीवरी से पहले की पुष्टि हो जाए तो डॉक्टर महिला के लिए खून की कोशिकाओं (बॉन मेरो) बदलने का इंतजाम जरूरी इलाज शुरू कर सकते है। ताकि बच्चे में खून की कमी ना हो। थैलेसीमिया से नवजातों को सुरक्षित रखने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने इसके टेस्ट की पहल की है। अब सभी अस्पताल प्रमुखों को थैलेसीमिया के टेस्ट शुरू कर इसकी जांच रिपोर्ट मुख्यालय को सौंपनी है।

दवा के लिए कई बार भेज चुके डिमांड : डॉ. मुनीष

डिप्टीसिविल सर्जन डॉ. मुनीष कुमार ने बताया कि सरकार ने डिलीवरी से पहले हर महिला का थैलेसीमिया टेस्ट करने के आदेश दिए हैं, ताकि जच्चा बच्चा की सुरक्षा के लिए समय पर कदम उठाए जा सके। लेकिन अस्पताल में इसके लिए दवा उपलब्ध नहीं है। इसके लिए कई बार डिमांड भेज चुके हंै। जैसे ही अस्पताल में दवा आती है तो लैब टेक्निशियन को ट्रेनिंग देकर टेस्ट शुरू कर दिए जाएंगे।

डॉ. सुखदीप कौर ने बताया कि थैलेसीमिया एक खतरनाक जानलेवा बीमारी है। इससे ग्रस्त मरीजों की खून की सेल खराब होती है। इसी कारण मरीज की हर बाॅन मेरो(जहां खून की कोशिकाएं बनती हैं) बदलनी पड़ती है। खून की कमी के कारण मरीज की मौत भी हो सकती है। थैलेसीमिया की मेजर माइनर दो स्टेज होती है। मेजर थेलीसिमिया में इंफेक्शन के चांस बढ़ जाते हंै। चेहरे पर सूजन जाती है। इसके लिए हिमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस टेस्ट होता है। थैलेसीमिया के टेस्ट में माइक्रोस्कोप में ब्लड सैल की सेप कुछ अलग मिलती है। जिससे थैलेसीमिया साबित होता है। इसका इलाज काफी महंगा होता है और यह जीन प्रॉब्लम है। माता-पिता से बच्चे में प्रवेश करने के चांस बने रहते है।

पानीपत. सिविलअस्पताल में इलाज के लिए पहुंचे मरीज।

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