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9वीं में स्कूल छूटा, ज़िद की अब 11 बच्चों का उठाया खर्च

5 वर्ष पहले
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पानीपत। घर में 2 गायों का दूध बेच और पिता की मजदूरी से परिवार का खर्च अच्छा चल रहा था। 42 साल पहलेे का वो दिन मैं कैसे भूल सकता हूं, उस समय मैं 9वीं कक्षा में पढ़ता था। स्कूल में ही एक सहपाठी ने बताया कि इंद्र भाई तुम्हारे पिता का एक्सिडेंट हो गया है। स्कूल बैग छोड़ रोता-चिल्लाता घर पहुंचा।

नूरवाला निवासी इंद्र सिंह बताते हैं कि उस दिन स्कूल में बैग ही नहीं मेरी पढ़ाई भी छूट गई थी। पिता रामकिशन तनेजा दिल्ली अस्पताल में 2 साल तक भर्ती रहे। महंगे इलाज में खेत बिक गए और परिवार पर आर्थिक संकट गहरा गया। पिता की जान बचाने के लिए डॉक्टरों को एक पैर काटना पड़ा। छोटे भाई 3 बहनों की पढ़ाई के साथ पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर गई जब मैं 16 साल का था। परिवार बड़ा होने के कारण भाई-बहनों को नहीं पढ़ा सका। इसका तभी से मलाल था और ठान भी लिया कि किसी मजबूर को पढ़ाई नहीं छोड़ने दूंगा। अब जरूरतमंद 11 बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च 7 साल से वहन कर रहा हूं। यह मानकर कि यही मेरी भाई-बहन है।
रोती हुई निशा देखी तो शुरू हो गई मुहिम
इंद्रसिंह का नूरवाला बस स्टैंड के सामने प्रॉपर्टी एडवाइजर का आफिस है। उन्होंने बताया कि आफिस के सामने ही सब्जी की रेहड़ी लगाने वाले की बेटी निशा रो रही थी। उसे लाड़-लड़ाने की कोशिश की तो बोली मेरे पिता ने पढ़ाई छुड़ा दी है। इसलिए रो रही हूं। निशा नूरवाला स्थित पूजा माडर्न स्कूल में नर्सरी में पढ़ती थी। उसके पिता से बात की तो घर की आर्थिक स्थिति कमजोर बताई। स्कूल जाकर निशा को दोबारा नाम लिखवाया और तभी से आज छठी कक्षा तक उसकी पूरी पढ़ाई का खर्च चला रहा हूं। समय निकालते ही निशा की तरह पढ़ाई में होशियार और मजबूर बच्चों की तलाश की तो इसी स्कूल का एक और लड़का सिद्धार्थ मिला।

पढ़ाई में बहुत होशियार लेकिन माता-पिता पढ़ाई में समर्थ नहीं होने पर पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो गया। नौंवी कक्षा में पढ़ रहे सिद्धार्थ की भी पूरी पढ़ाई का खर्च 5 साल पहले उठाना शुरू किया। इन्हीं बच्चों में पानीपत के अन्य स्कूलों में पढ़ रहे 7 बच्चे, 1 करनाल 1 कैथल में पढ़ रहे बच्चे की पढ़ाई का खर्च खुद ही उठा रहे हैं।

पिता के अपाहिज होने पर ही मन में ठान लिया था कि किसी मजबूर बच्चे को नहीं छाेड़ने दूंगा पढ़ाई।
1 बेटी को डॉक्टर 1 को बनाया मैनेजर
इंद्र सिंह की 2 ही बेटियां हैं। बड़ी बेटी नितिका कैंसर पर पीएचडी करने के बाद मुंबई स्थित टाटा कैंसर अस्पताल में ट्रेनिंग के बाद वहीं डॉक्टर अप्वाइंट हो गई और गरीबों की सेवा कर रही है। वहीं छोटी बेटी भूमिका तनेजा एमबीए तक पढ़ाई करके मुंबई में ही एक कंपनी में मैनेजर बन गई। बड़ी बहन की शादी तो पिता के हाथों हुई लेकिन 2 छोटी बहनों एक भाई की शादी का पूरा खर्च इंद्र सिंह ने ही उठाया। इनका मानना है कि कोई भी इंसान जितना दान करेगा, ऊपर वाला उससे ज्यादा देगा। नेकी कर, दरिया में डाल, यह नियम जीवन में अपनाया और ठान किया कि किसी बच्चे को पढ़ाई नहीं छोड़ने देंगे। इसी बात को जीवन में अपना इन 11 बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं।
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