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दो बुजुर्गों के जज्बे की कहानी; बुन सकते हैं सपना, कर सकते हैं दुनिया रोशन

6 वर्ष पहले
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पानीपत| पानीपत के बुड़शाम गांव की 95 साल की शांति देवी के इकलौते बेटे को जब लकवा हुआ तो तीन पोतियों व एक पोते की पढ़ाई का जिम्मा आन पड़ा। हार नहीं मानी, रोजाना 8 से 9 घंटे दरी बुनकर बच्चों को पढ़ा रही हैं। शांति देवी कहती हैँ कि उन्हें उस दिन तसल्ली मिलेगी जब उनके पोते-पोतियां पढ़ लिखकर काबिल हो जाएंगे।
हाथ फैलाने से अच्छी है मेहनत
शांति देवी ने बताया कि उनके पति दुनिया में नहीं हैं। बेटे कर्ण सिंह को लकवा हो गया है। पूरे घर की जिम्मेवारी बूढ़े कंधों पर आन पड़ी। गुजारा चलाना था तो दिल मजबूत किया। पहले महीने में 5 से 7 दरी बना लेती थी, पोते पोतियों की पढ़ाई का खर्च नहीं निकला। फिर भी वह तीन दरियां बना लेती हैं और 900 रुपए का जुगाड़ हो गया। बुढ़ापा पेंशन की 1200 रुपए राशि जोड़ कुल 2100 रुपए माह में जुड़ पाते हैं। राशन और पढ़ाई का खर्च निकल ही जाता है।

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