पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • आस्था और कंबल की चाह में हजार किमी का सफर

आस्था और कंबल की चाह में हजार किमी का सफर

7 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
आस्थाऔर कंबल। इन दोनों का क्या मेल? वो भी इतना कि हजार किलोमीटर लंबा सफर तय करके भी कुछ श्रद्धालु हर साल पानीपत पहुंचते हैं। तीन या चार नहीं, पिछले चालीस सालों से लगातार। दरअसल, देवी मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा पर माथा टेकने के लिए आने वालों को मुफ्त में कंबल बांटे जाते हैं। कुछ श्रद्धालुओं को आस्था खींच लाती है तो कुछ श्रद्धालु कहते हैं कि देवी मां के दर्शन हो जाते हैं और फिर अगर कंबल मिलता है तो लेने में हर्ज क्या।

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के श्रद्धालु गेरुआ वस्त्र धारण कर 4 दिन पहले ही मंदिर परिसर में पहुंचने लगते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं, जो 40 सालों से निरंतर रहे हैं। 70 वर्षीय नीमाबाई ने बताया कि वह 30 साल की थीं, तब से रही हैं। देवी मां के दर्शन भी हो जाते हैं और कंबल भी मिल जाता है।

क्या पहले भी कंबल मिलते थे? जवाब दिया, पहले तो तीन-तीन कंबल मिलते थे, इस बार एक ही मिला। यहां की कस्तूरीबाई, शांतिबाई, सुकरानी, फूलरानी, भगवती सहित करीब 200 लोग मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों से हैं। ये दो दिन पहले पहुंचे थे।

पटना से आए जवाहर पासवान को दोपहर 12 बजे तक कंबल नहीं मिला। संचालक काकू बंसल ने कहा- अभी और भी दानी कंबल लेकर आएंगे, तब मिल जाएगा। फरक्का एक्सप्रेस से दिल्ली, फिर वहां से बुधवार को पहली बार पानीपत आए जवाहर ने बताया कि यहां कई लोग रहते हैं, जिससे पता चला कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन कंबल मिलता है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से आईं देवकी ने बताया कि मूल मकसद तो पूजा ही है। अब कंबल मिल जाता है तो ले लेती हैं।

पानीपत. कार्तिकपूर्णिमा पर देवी मंदिर में वितरण के बाद कंबल समेटते हुए।

मराठों का मंदिर, 9वीं सदी से बताते हैं संबंध

कहतेहैं कि 18वीं सदी में देवी मंदिर का निर्माण मराठों ने किया था। मंदिर में 8वी-9वीं सदी की भगवान हरिहर, शिवलिंग, गणेश अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाें के साथ ही बाला सुंदरी, भद्रकाली, लक्ष्मी नारायण, राम दरबार, राधा कृष्ण, हनुमान, नवग्रह, शिव परिवार, काल भैरव, शनि देव, बाबा शिवगिरि की भव्य प्रतिमाओं के साथ-साथ गंगा, यमुना सरस्वती का मंदिर भी स्थापित है।

आना-खाना-जाना मुफ्त

येश्रद्धालु गेरुआ वस्त्र में होते हैं, जो मुफ्त में ट्रेनों में सफर करते हैं। सागर से 974 किलोमीटर और पटना से 1083 किलोमीटर दूरी त