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पितरों को आज आखिरी तर्पण, मां दुर्गा के नौ रूपों की अाराधना कल से
नौ दिनों तक पूजन
अश्विनीकृष्णपक्ष की अमावस्या, 23 सितंबर, मंगलवार को जातकों ने अपने पूर्वज पितरों को पिंडदान कर दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, लक्ष्मी, पशु, सुख साधन तथा धन-धान्य की मन्नतें मांगी। 24 सितंबर, बुधवार को देवकार्य अमावस्या पर अपने देवी देवताओं के निमित स्नान, दानव पूजा अर्चना की जाएगी।
घाटपर पहुंच किया पिंडदान
जातकोंने अपने क्षेत्रों के पवित्र घाटों पर पहुंच विधि विधान से अपने पूर्वज पितरों के निमित विधि विधान से पूजा की। तहसील कैंप स्थित श्री बलराम धाम मंदिर के पंडित रामप्रकाश पाराशर ने बताया कि धर्मशास्त्रों में कहा गया है पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि, सौभाग्य मोक्ष की प्राप्ति होती है। आश्विन मास के पितृ पक्ष में पितरों को आस लगी रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिंडदान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं। पितरों के निमित श्राद्ध एवं तर्पण दान करने अभिलाषाएं पूरी होती हैं।
प्रथम : शैलपुत्री- नवरात्रके पहले दिन मां के रूप शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। मां को समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है। इनकी आराधना से आपदाओं से मुक्ति मिलती है
द्वितीय:ब्रह्मचारिणी- दूसरेदिन मां के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की आराधना की जाती है। ब्रह्मचारिणी, ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या, यानी तप का आचरण करने वाली भगवती। मां की उपासना करने से किसी भी प्रकार की बाधा का सामना आसानी से कर सकते हैं।
तृतीय: चंद्रघंटा- तीसरेदिन मां दुर्गा की तीसरी शक्ति माता चंद्रघंटा की पूजा अर्चना की जाती है। मां की उपासना से भौतिक, आत्मिक, आध्यात्मिक सुख और शांति मिलती है।
चतुर्थ: कुष्मांडा- चौथेदिन मां कुष्मांडा की पूजा होती है। मंद-मंद मुस्कान भर से ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने के कारण इन्हें कुष्मांडा के नाम से जाना जाता है। मां कुष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं।
पंचम: स्कंदमाता- पांचवेंदिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। आदिशक्ति का ये ममतामयी रूप है। स्कंदमाता की पूजा से सभी मनोरथ पूरे होते हैं। साधक को शांति और सुख का अनुभव होने लगता है।
षष्ठी: कात्यायनी- छठवेंदिन मां कात्यायनी की पूज