मेरी जड़ें
गांव छोड़ शहर में बसे, जरूरत पड़ी तो भतीजे को किडनी देकर बचाई जान
पानीपत | 72वर्षीय ओम प्रकाश खुराना बड़ोली गांव छोड़कर शहर में बसे, लेकिन जड़ें तो गांव में ही थी। इसलिए जब परीक्षा की घड़ी आई तो किडनी देकर भतीजे की जान बचाई।
खुराना आज अपने दोनों बेटों सुधीर खुराना, मनोज खुराना परिवार के अन्य सदस्यों के साथ खुशहाल से हैं। वर्ष 1990 से 2000 तक गांव में लगातार सरपंच रहे खुराना वर्ष 2001 में पानीपत आकर बस गए। इससे पहले बेटों के सहयोग से पहले शहर में हाथ रिक्शा किराया पर देते थे। फिर शहर में दवा की एक मेडिकल दुकान खोली।
खुराना ने बताया कि गांव के श्मशान घाट की जमीन पर कुछ लोगों ने अवैध कब्जा कर लिया। जिसे छुड़ाना बड़ी चुनौती थी, लेकिन ग्रामीणों के सहयोग से ही उस जमीन को कब्जा मुक्त कराया। गांव के प्राइमरी स्कूल की बिल्डिंग जर्जर हाल में थी। सरकार कोई सुध लेने को तैयार नहीं हुई तो पंचायत के पैसे से ही बिल्डिंग बनाई।
खुराना का मध्यम वर्गीय परिवार आज पूरा खुशहाल है। सभी यहां यमुना एनक्लेव में अपने मकान में एक साथ ही रहते हैं। दोनों बेटे दवा के कारोबार से जुड़े हैं। एक पोती एमबीबीएस कर रही है। खुराना कहते हैं कि मेहनत से पाए सुख में बड़ा आनंद मिलता है। उन्होंने कहा कि कोई कितना बड़ा ही क्यों हो जाए, उसे अपनी जड़ें नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि आदमी की पहचान पुरखों की जड़ से ही मिलती है।
ओमप्रकाश खुराना