तस्वीर देखते ही पिता के दुश्मन की हो गई दीवानी, मूर्ति को पहना दी वरमाला / तस्वीर देखते ही पिता के दुश्मन की हो गई दीवानी, मूर्ति को पहना दी वरमाला

अपनी प्रेमिका का अपहरण उसके पिता के सामने उस वक्त कर लिया जब उसका स्वयंवर चल रहा था।

May 06, 2014, 02:46 AM IST
love story of prithviraj chauhan and sanyogita hisar haryana
पानीपत. हरियाणा की माटी सदैव से ही महापुरुषों और वीरों की भूमि रही है। वीरभूमि के साथ-साथ आज भी लोग वीरयोद्धाओं को उनकी प्रेम कहानियों को लिए याद रखते हैं। चाहे वो अकबर हों या फिर मुगल काल में उनके विरोधी।
dainikbhaskar.com 'इतिहास के झरोसे से' सीरीज के तहत आपको बता रहे हैं एक ऐसे प्रेमी की कहानी जिसने अपनी प्रेमिका का अपहरण उसके पिता के सामने उस वक्त कर लिया जब उसका स्वयंवर चल रहा था।
दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू शासक और भारत के महान वीर योद्धाओं में शामिल पृथ्वीराज चौहान का नाम कौन नहीं जानता। एक ऐसा वीर योद्धा जिसने अपने बचपन में ही शेर का जबड़ा फाड़ डाला था और जिसने अपनी आंखे खो देने के बावजूद भी मोहम्मद गौरी को हराकर उनकी मृत्यु कर दी थी।
ये सभी जानते हैं कि पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा थे लेकिन ये बहुत कम ही लोगों को पता है कि वो एक महान प्रेमी भी थे। वो कन्नौज के महाराज जय चन्द्र की पुत्री संयोगिता से प्रेम करते थे। दोनो में प्रेम इतना था कि राजकुमारी को पाने के लिए पृथ्वी स्वयंवर के बीच से उन्हें उठा लाए थे। हालांकि इस प्रेम कहानी की शुरुआत के पीछे भी एक कहानी है। संयोगिता ने अपने महल में आए एक चित्रकार के चित्र देखते हुए पृथ्वीराज चौहान का चित्र देखा था। चित्र देखते ही संयोगिता उन्हें दिल दे बैठीं थी। वहीं, चित्रकार ने संयोगिता का चित्र पृथ्वीराज चौहान को दिखाया तो वो भी मन ही मन उनसे प्रेम करने लगे थे। इस प्रेम कहानी में और भी कईं रोचक मुकाम आए। आइए हम आपको बताते हैं कि आखिर कैसे शुरू हुई संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी।
नोटः पृथ्वीराज चौहान ने मुगल शासकों से रक्षा के लिए हरियाणा के हिसार में एक किले का निर्माण कराया था। हालांकि बाद में मुगल शासकों ने इस किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद इस किले में एक मस्जिद का निर्माण भी कराया गया था। पर्यटक आज भी इस किले और मस्जिद के खूबसूरत दृश्य देख सकते हैं।
आगे की स्लाइड्स में पढ़िए कैसे शुरू हुई, पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेम कहानी...
(नोट: तस्वीरों का इस्तेमाल केवल प्रतीक स्वरुप किया गया है।)
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नाना की मौत के बाद मिली दिल्ली की गद्दी
 
बात उन दिनों की है जब पृथ्वीराज चौहान अपने नाना और दिल्ली के सम्राट महाराजा अनंगपाल की मृत्यु के बाद दिल्ली की राज गद्दी पर बैठे। गौरतलब है कि महाराजा अनंगपाल के कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपने दामाद अजमेर के महाराज और पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर सिंह चौहान से आग्रह किया कि वे पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित करने की अनुमति प्रदान करें।
 
महाराजा सोमेश्वर सिंह ने सहमती जता दी और पृथ्वीराज को दिल्ली का युवराज घोषित किया गया, काफी राजनीतिक संघर्षों के बाद पृथ्वीराज दिल्ली के सम्राट बने। उसी समय कन्नौज में महाराज जयचंद्र का राज था और उनकी एक खूबसूरत राजकुमारी थी जिसका नाम संयोगिता था। जयचंद्र पृथ्वीराज की यश वृद्धि से ईर्ष्या का भाव रखा करते थे।
 
आगे पढ़ें...चित्रकार ने दिखाई थी पृथ्वीराज सिंह की तस्वीर
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चित्रकार ने दिखाई थी पृथ्वीराज सिंह की तस्वीर
 
एक दिन कन्नौज में एक चित्रकार पन्नाराय आया जिसके पास देश-दुनिया की कई हस्तियों के चित्र थे और उन्ही चित्रों में एक चित्र था दिल्ली के युवा सम्राट पृथ्वीराज चौहान का। जब कन्नौज की लड़कियों ने पृथ्वीराज के चित्र को देखा तो वे देखते ही रह गईं, हर कोई पृथ्वीराज की सुन्दरता का बखान कर रहीं थीं।
 
पृथ्वीराज की तारीफ संयोगिता के कानों तक भी पहुंची और वे पृथ्वीराज के उस चित्र को देखने के लिए लालायित हो उठीं। संयोगिता अपनी सहेलियों के साथ उस चित्रकार के पास पहुंची और चित्र दिखाने को कहा, जैसे संयोगिता ने पृथ्वीराज का चित्र देखा वे मोहित हो गईं और वह चित्र चित्रकार से ले लिया। इधर चित्रकार ने दिल्ली पहुंचकर पृथ्वीराज से भेट की और राजकुमारी संयोगिता का एक चित्र बनाकर उन्हें दिखाया जिसे देखकर पृथ्वीराज के मन में भी संयोगिता के लिए प्रेम उमड़ पडा।
 
आगे पढ़ें...मूर्ती को पहना दी थी वरमाला
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मूर्ती को पहना दी थी वरमाला
 
उन्हीं दिनों महाराजा जयचंद्र ने संयोगियिता के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें विभिन्न राज्यों के राजकुमारों और महाराजाओं को आमंत्रित किया गया। लेकिन, ईर्ष्यावश पृथ्वीराज को उन्होंने इस स्वंयवर में आमंत्रित नहीं किया और उनका अपमान करने के उद्देश्य से उनकी एक मूर्ती को द्वारपाल की जगह खड़ा कर दिया।
 
जब राजकुमारी संयोगिता वर माला लिए सभा में आईं तो उन्हें अपने पसंद का वर नजर नहीं आया तभी उनकी नजर द्वारपाल की जगह रखी पृथ्वीराज की मूर्ती पर पड़ी और उन्होंने आगे बढ़कर वरमाला उस मूर्ती के गले में डाल दी।
 
आगे पढ़ें...घोड़े पर बिठाकर संयोगिता को अपने राज्य ले आए थे पृथ्वीराज
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घोड़े पर बिठाकर संयोगिता को अपने राज्य ले आए थे पृथ्वीराज
 
वास्तव में वहां मूर्ती की जगह पृथ्वीराज स्वयं आकर खड़े हो गए थे। संयोगिता द्वारा पृथ्वीराज के गले में वरमाला डालते देख जयचंद्र आग बबूला हो गया और वह तलवार लेकर संयोगिता को मारने के लिए दौड़ा लेकिन पृथ्वीराज संयोगिता को अपने घोड़े पर बिठाकर वहां से अपने राज्य ले गए।
 
जिसके बाद जयचंद्र ने पृथ्वीराज से बदला लेने के उद्देश्य से मोहम्मद गौरी से मित्रता की और दिल्ली पर आक्रमण कर दिया।
 
आगे पढ़ें...17 बार हराया था मोहम्मद गौरी को
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17 बार हराया था मोहम्मद गौरी को
 
पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को 17 बार परास्त किया लेकिन 18वीं बार मोहम्मद गौरी ने धोखे से उन्हें गिरफ्तार कर लिया और तपती हुईं सलाखों से उनकी फोड़ दीं।
 
फिर भी पृथ्वीराज ने हार नहीं मानी और अपने मित्र चन्द्रवरदाई के शब्दों के संकेतों को समझ मोहम्मद गौरी को मार डाला। साथ ही दुश्मनों द्वारा दुर्गति से बचने के लिए चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज ने एक-दूसरे का वध कर दिया। जब संयोगिता को इस बात की जानकारी मिली तो वह एक वीरांगना की भांति सटी हो गई।इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में आज भी यह प्रेमकहानी अमर है।
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