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बिहार के कारीगर बना रहे मां दुर्गा की मूर्ति, 25 सितंबर से शुरू होंगे नवरात्र

7 वर्ष पहले
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पानीपत। अशुभ शक्तियों का दमन, शुभ शक्तियों का आगमन व भक्तों पर असीम कृपा बरसाने के लिए भक्तों के द्वार पहुंचने वाली मां दुर्गा के असीम रूप को बिहार से पहुंचे कारीगर तैयार कर रहे हैं। शहर में गोहाना रोड ओवरब्रिज के नीचे किशनलाल प्रजापत, उनका परिवार व बिहार से पहुंचे कारीगर मां दुर्गा, गणेश, कार्तिकेय, सरस्वती व लक्ष्मी मां की मूर्ति को तैयार कर रहे हैं। 25 सितंबर को नवरात्र के साथ ही मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा शुरू हो जाएगी।
मां दुर्गा की मूर्ति के लिए करनाल, निसिंग व असंध से भी आॅर्डर मिले हैं। किशनलाल प्रजापत ने बताया कि उनके परिवार व परिजन भी मां दुर्गा की मूर्ति तैयार कराने में हाथ बटाते हैं। बेटी जीत मूर्ति में रंग भरती है। उन्होंने बताया कि मूर्ति का रूप वे किसी बड़ी कमाई के लिए नहीं करते। मां की कृपा से बर्तन व अन्य सामान ठीक ठाक बिक जाते हैं। उन्होंने बताया कि मां दुर्गा का रूप 7 फीट, गणेश, सरस्वती, कार्तिकेय व लक्ष्मी मां की मूर्ति 5-5 फीट की बनाई जा रही है।

मूर्ति निर्माण में विशेष रूप से बिहार के जिला मधेपुरा के गांव धौलाढ़ से उपेंद्र मंडल व विजय मंडल, समस्तीपुर से लाल बहादुर पंडित को आमंत्रित किया गया है। उन्होंने बताया कि मां दुर्गा की कृपा से मूर्ति निर्माण की कला पाई है। भक्तों को मां की पूजा करने से कृपा प्राप्त होती है। हमें मां का रूप तैयार करने पर उनकी कृपा मिलती है।
यह है परंपरा : कन्याओं का होता है पूजन
चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी को दुर्गा अष्टमी की पूजा श्रद्धाभाव से होती है। इसे अशोकाष्टमी भी कहा जाता है। जिसे कभी शोक (दुख) नहीं होता, वही अशोक है। श्री सनातन धर्म शिव मंदिर के पुजारी पंडित राम प्रकाश पाठक ने बताया कि शास्त्र अनुसार अशोकाष्टमी के दिन अशोक के पुष्पों से देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। भगवती दुर्गा को उबले हुए चने, हलवा-पूरी, खीर व पुए का भोग लगाया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा की मूर्ति का मंत्रों से विधिपूर्वक पूजन किया जाता है।
शास्त्र अनुसार इस दिन कन्या पूजन करने का विधान है। शास्त्र अनुसार अशोकाष्टमी के दिन अशोक के पुष्पों से देवी दुर्गा की पूजा की जाती है। अशोक की आठ कलियों से युक्त जल पीना तथा इस मंत्र के देवी दुर्गा की पूजा करनी चाहिए। अशोक वृक्ष को भगवान श्रीराम ने शोक दूर करने वाले पेड़ की उपमा दी थी। शास्त्र अनुसार अशोक वृक्ष को पवित्र माना गया है। शोक (दु:ख) को दूर करने के कारण ही इसे अशोक नाम की उपमा दी गई है। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि कामदेव के पंच पुष्प बाणों में एक अशोक के पुष्पों का बाण है। रावण ने सीता हरण के बाद उन्हें अशोक-वाटिका में ही जगह दी थी।
(फोटो- पानीपत में मां दुर्गा की मूर्ति में रंग भरता कारीगर।)