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संदीप की मौत से रोया शाहपुर, दीवारों पर भी इस आर्य की छाप

8 वर्ष पहले
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पानीपत. शहर से 27 किलोमीटर दूर गोहाना रोड पर शाहपुर गांव के आर्य समाज भवन में अगले रविवार को भी पावन हवन कुंड दहकेगा, लेकिन इस बार संदीप आर्य मंत्र नहीं पढ़ेंगे। पुलिस की गोली ने रोहतक में उनके प्राण जो ले लिए। शाहपुर स्तब्ध है। गुस्से में है। और फिलहाल चुप भी। उन्हें बस संदीप के अंतिम दर्शन चाहिए। 27 साल के संदीप शाहपुर वालों के लिए कोई आम युवक नहीं थे।

उनके लिए प्रेरणा थे। बुराइयों से खुद को दूर रखने की। धर्म के नाम पर पाखंड से बचने की और वेदों की ओर चलने की। गांव के चप्पे-चप्पे पर संदीप के निशान हैं। घर-घर पर आर्य समाज की पताका लहरा रही है। शाहपुर नाके की उस पुलिस चौकी पर भी आर्य समाज की शिक्षा छपी है, जहां आज एहतियातन तीन-तीन पुलिस पीसीआर तैनात हैं। ऐसी शिक्षाएं संदीप ने खुद अपने हाथ से गांव की हर दीवार पर छापी थीं।

25 दिसंबर,1985 को जन्मे संदीप के गांव और पूरे परिवार पर शुरू से ही आर्य समाज का गहरा प्रभाव है। यह उसके व्यक्तित्व का अकेली पहचान नहीं थी। पिछले एक साल से वह आर्य बाल भारती स्कूल में पीटीआई और योग के टीचर थे। दसवीं पास करते-करते उन्हें कुश्ती का शौक हो गया। पिता राम मेहर कुंडू ने उन्हें कुश्ती सिखाने के लिए सोनीपत के सुभाष स्टेडियम भेज दिया।

कुश्ती में उनका मन पूरी तरह रमा नहीं। आर्य समाज उन्हें बार-बार खींच रहा था। इस बार पिता ने रोहतक के सिंहपुरा स्थित गुरुकुल भेज दिया। यहां उन्होंने आर्य समाज की औपचारिक शिक्षा ली। इस बीच 2008 में उनकी शादी हो गई। घर पर कोई कमी नहीं थी मगर रोजीरोटी खुद कमानी थी। इसलिए अखबार की तरफ रुख कर लिया। जुलाई 2010 से जून 2011 तक संदीप ने अखबार में पेज डिजाइनर के रूप में काम किया। मन फिर भी नहीं लगा। आखिरकार उन्होंने अपना पूरा जीवन आर्य समाज को सौंपने का फैसला किया। नवंबर 2011 से संदीप आर्य बाल भारती स्कूल में नौकरी कर रहे थे। इसी स्कूल में ही वह अपने पत्नी कविता, साढ़े चार साल की बेटी गार्गी और तीन साल के बेटे अभिमन्यु के साथ रहते थे।