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कॉरपोरेट ने थियेटर संस्कृति को किया बर्बाद
आईआईएम में उड़ान 2014-शून्य के ईद गिर्द ही घूमता है जीवन
भारतमुनि का नाट्य शास्त्र यहां लिखा गया है। इसके बाद भी हिंदुस्तान में कभी थियेटर संस्कृति बन ही नहीं सकी। देश में जन्म होने के बावजूद विदेशों में इसे परवरिश मिल रही है। देश में आज थियेटर कारपोरेट जगत के हाथों में खेल रहा है। इसने थियेटर को बर्बाद कर दिया है। जो कलाकार दिखाना चाहते हैं वह नहीं दिखाया जा रहा है। बॉलीवुड फिल्म मकबूल और गैंग्स आॅफ वासेपुर फेम गायक एवं थियेटर कलाकार पीयूष मिश्रा की इस चिंता ने आईआईएम के देशभर से आए भावी प्रबंधकों को झकझोर दिया। 20 साल तक वामपंथियों से प्रेरित होकर थियेटर और ड्रामा शुरू करने वाले पीयूष मिश्रा कहते हैं कि वाम (लेफ्ट) दिन काटने का जरिया होता था। अब कम्यूनिज्म कहीं बचा ही नहीं है।
उस समय क्रांति लाने का जुनून सवार था। दिनभर जंतर-मंतर पर थियेटर करने के बाद रात 9 बजे सोते और सोचते कि कल क्रांति ही जाएगी। फिर सोचा कि परिवार की कीमत पर भगत सिंह बनना ठीक नहीं है और लेफ्ट को छोड़ दिया।
थियेटरको बैंक भी लोन नहीं देता
हिंदुस्तानमें थियेटर की कोई इंडस्ट्री पनप ही नहीं सकी, जबकि इंग्लैंड जैसे देशों में भी इसके लिए खूब काम किया जा रहा है। टिकट भी ब्लैक मेें मिलती है। वहां आज भी शेक्सपियर के नाटकों को थियेटर के जरिए जिंदा रखा गया है। हमारे देश में थियेटर के नाम पर बैंक भी लोन नहीं देता। कोई स्टेट थियेटर को मान्यता नहीं देना चाहता। हमें थियेटर की अपनी संस्कृति को उभारना होगा, सामाजिक मुद्दों के लिए इससे लड़ा जा सकता है।
थियेटर जीने का सलीका सिखाता है। आज जो मैं खा रहा हूं, बस थियेटर की बदौलत ही है। मैं उस दौर से गुजरा जब पैसा नहीं मिलता था। कमीज बदरंग हो जाती थी, सड़कों पर सोते थे और पुरानी टिकट देखकर खुश होते थे। बस मंच से तालियां मिलती थी। सिर्फ काम करते रहे, क्या बनना है कभी नहीं सोचा। सुकून बड़ी चीज है, शांति, पीस ऑफ माइंड, काम से सुकून मिलना चाहिए बस। एक समय था जब 90 के दशक में दिल्ली का मंडी हाउस खचाखच थियेटर करने वाले कलाकारों से भरा रहता था, उस समय हमें एक कोना तक नहीं मिलता था रिहर्सल करने के लिए।
पीयूष कहते है कि मैं मूल रूप से गिफ्टेड हूं, टेलेंटेड नहीं। जिंदगी एक हकीकत है, वह रोमांटिक नहीं होती। चूंकि ये लगातार घट रही है और हकीकत हमेेशा घटती है। ये सिर