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पश्चिमी संस्कृति में भूल गए अाचरण का व्याकरण
बर्बरताके बाद नेपाली युवती की हत्या का खुलासा होने से समाज का हर तबका हैरान है। दरिंदगी में एक ही गांव से 8 आरोपियों के शाामिल होने से प्रबुद्ध वर्ग ने भी माथा पकड़ लिया। वह भी नाबालिग किशोर से लेकर अधेड़ व्यक्ति तक की जघन्य करतूत ने नैतिक मूल्यों पर दोबारा से बहस शुरू कर दी है। गिरने, संभलने और समझने और समझाने की उम्र का यूं ही बीत रही है। ऋषियों की धरती पर आचरण की पाठशाला में जीवन का व्याकरण हम भूलते जा रहे हैं। इसका खामियाजा हमारी बहू-बेटियों की बार-बार आहुति डालकर समाज को चुकानी पड़ रही है। दैनिक भास्कर ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के शीर्षस्थ लोगों से जब इस सिलसिले में संपर्क साधा तो उनका क्षोभ, गुस्सा, बेबसी और मूल्यविहीन भारत के भविष्य की खतरनाक होती तस्वीर सामने गई। प्रस्तुत है बातचीत के खास अंश...
बच्चों में अच्छे संस्कार की जरूरत : प्रो. राधेश्याम
^मनोविज्ञानविभाग के प्रो. राधेश्याम कहते हैं कि संस्कार और मूल्यों में निरंतर गिरावट रही है। ये एक सामाजिक और पारिवारिक समस्या के तौर पर उभर रही है। कुछ केस में ये यौनिक विकार की भी समस्या हो सकती है। आपराधिक प्रवृति वाले लोग भी इस तरह की अंजाम दे सकते हैं। नैतिक मूल्यों में गिरावट बढ़ रही है। इसे रोकने के लिए जरूरी है कि समाज और परिवारों को मिलकर बच्चों में अच्छे संस्कार दें। मानसिक बीमार लोगों की जांचकर उन्हें काउंसलिंग और उनका इलाज किए जाने जरूरत है। इस तरह का मामला पहले कभी देखा और सुना भी नहीं गया है। ऐसे में संस्कारों की कमी ही सबसे ज्यादा खलती है। परिवार में ही संस्कारों को बढ़ाया जाना चाहिए। बच्चों को शुरू से ही अच्छी सीख देनी चाहिए कि वे दूसरों को सम्मान दें।
सिर्फ कैंडल मार्च नहीं, बदलाव भी जरूरी : चहल
^एमडीयूके कुलपति एचएस चहल कहते हैं कि समाज में बचपन से ही परिवारों में अच्छी बातें सिखाई जाती थी। बड़ों का आदर भी खूब होता था। महिला और युवती को माता और बहन की नजर से देखा जाता था, लेकिन अब मूल्यों को बढ़ाने के लिए जरूरी हैं कि गुरुजन और टीचर इसमें योगदान दें। बच्चों में अच्छी संगत दी जाए, अभिभावक अपने साथ ही बच्चों में भी अच्छे संस्कार दें, ताकि उन्हें भी नई दिशा मिल सके। अब भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास पूरा समय नहीं है। ऐसे में जरूरी है कि बच्चों को भी ज्यादा से ज्यादा समय देकर उन्हें अच्छा इंसान बनाया जाए। वहीं वारदात के बाद कैंडल मार्च निकालने से अच्छा है कि वे युवाओं को सुधारने की पहल करें। रोष और गुस्से से कुछ नहीं होगा, प्यार से ही बदलाव हो सकते हैं।
अंधी नकल ने डाला अक्ल पर पर्दा
^पश्चिमीसभ्यता की अंधी नकल ने ही हमारी अक्ल पर पर्दा डाल दिया और हम इंसान की शक्ल में भूखे भेड़िए बनते जा रहे हैं। इसके लिए कोई और नहीं स्वयं जिम्मेदार हैं। बदलाव और प्रगति के नाम पर वह सब कुछ करते गए, जिन पर पूर्वजों की ओर बंदिश रही। टोकने पर तपाक से जवाब भी दिया कि आज के दौर में ये बातें मूल्यहीन हैं। मगर आजादी के नाम पर इसी खुलेपन ने सारा कबाड़ा कर दिया। औरत की इज्जत तक जब तार-तार होने लगी तो चारों ओर हाय तोबा मची हुई है। जनाब! अपनी जड़ों की ओर लौटे बिना कल्याण संभव ही नहीं है। नई पीढ़ी को सबसे ज्यादा संस्कारवान बनाने की जरूरत है। आज इस विषय पर सरकारी और सामाजिक दोनों स्तर पर पहल करनी होगी। नैतिकता की बुनियाद को मजबूत किए बिना आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण करना मुश्किल होता है। -अश्विनीसभरवाल, वीसी स्टेट यूनिवर्सिटी।
नशे ने बिगाड़ा मानसिक संतुलन
^बहसका मुद्दा बाद में, पहले दरिंदों को मिलने वाली सजा पर कहना चाहूंगा। समाज को भूलने वाला जख्म देने वालों की सजा भी इतनी कठोर होनी चाहिए, ताकि गलत कदम उठाने से पहले याद कर अपराधियों की रूह कांप जाए। इस घटना से साबित होता है कि वैचारिक स्तर पर अभी और मेहनत करने की आवश्यकता है। हमने संसाधनों सेे खुद काे समृद्ध कर लिया, लेकिन हालात आदिम अवस्था के हैं। दरअसल शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक विकास भी जरूरी है। जब तक सोच का स्तर नहीं बढ़ेगा तब तक हालात बदलने वाले नहीं हैं। शिक्षा का स्तर भी सुधारना होगा। फिलहाल लोगों में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने सारा माहौल खराब कर दिया है। इसकी चपेट में हमारा युवा वर्ग भी है और इसके लिए कहीं कहीं अभिभावक भी जिम्मेदार हैं, जिनके ऊपर बच्चों को संस्कारित करने का भार है। -डॉ.वीके जैन, कार्यकारी वीसी हेल्थ विश्वविद्यालय।
^समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. कंवर चौहान कहते हैं कि दिल्ली में दिसंबर 2012 में निर्भया कांड के बाद कई तरह के कानून बने, लेकिन इन्हें मजबूती से लागू कर पाने के चलते भी इस तरह की वारदातें रूक-रूककर होती रहती हैं। ऐसे में जरूरत है सामाजिक नियंत्रण एजेंसी को निगरानी रखने की। बच्चों को हर स्तर पर प्यार के साथ सम्मान से व्यवहार करने की भी सीख देनी चाहिए। सामाजिक ताने-बाने में बच्चों के लिए रोल मॉडल का चयन किया जाता है। ऐसे में माता-पिता भी उन्हें ऐसे रोल-मॉडल चुनने के लिए प्रेरित करें, जिससे वे अपनी चुनौतियों को प्रमुखता से हासिल कर सकें। इस मामले के बाद पुलिस विभाग को भी चाहिए कि वे ऑटो चालकों के पहचान-पत्र तैयार करें, ताकि कहीं भी किसी भी तरह की चूक होने पर पड़ताल आसानी से हो सके। पुलिस की भी जवाबदेही होनी चाहिए कि कब तक वे पड़ताल को पूरा सकेंगे? जुर्म करने वाले मानसिक बीमार लोगों की भी पहचान की जाए, ताकि पॉलिसी मैटर बन सके।
दीप जलाने की परंपरा अपनाएं, की बुझाने की : प्रो. अमृता
^एमडीयूके मनोविज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. अमृता यादव कहती हैं कि नैतिक मूल्यों को बढ़ाने की काफी जरूरत हैं। परिवार में बच्चों को औरतों बेटियों की इज्जत करनी सिखानी होगी। परिवारों का संयुक्त ढांचा अब बदलने लगा है। इससे एकल परिवार बन गए हैं। पहले संयुक्त परिवारों में जो छोटे-छोटे फंक्शन होते थे, तो उनसे भी काफी चीजें सीखते थे। हमारे यहां कब संस्कृति बदल गई पता ही नहीं चला। आजकल जो जन्मदिन बनाते हैं उस पर मोमबत्ती बुझाते हैं, जबकि हमारी परंपरा दीप जलाने की रही है। मूल्य पहले सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बच्चों के हर फैसले फिलहाल हम खुद ही ले लेते हैं। हम पहल करें कि स्कूली बच्चों में सम्मान की बात रहे। ऐसे में बच्चों को ही जिम्मेदारी देने की जरूरत है। मनोविज्ञान विभाग की ओर से भी विश्वविद्यालय स्तर पर संवेदीकरण का काम किया जा रहा है। इसमें यूथ डेवलपमेंट भी बड़ा विषय है। सेंटर फॉर पॉजिटिव हेल्थ के जरिए भी उन्हें अच्छा दृष्टिकोण करने का प्रयास करते हैं। लोगों में अच्छाई बढ़ानी जरूरी है, ताकि बुरी चीजें खत्म हो जाएंगी।
बच्चों के सोशल मीडिया पर भी निगरानी जरूरी : पंकज
^समाजशास्त्र विभाग से पीएचडी स्कॉलर पंकज कहती हैं कि अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को शुरू से ही नारी जाति का सम्मान करने के संस्कार देने की जरूरत है। जब घर से ही ऐसे संस्कार मिलेंगे तो बच्चे आगे चलकर भी सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बना सकेंगे। इसमें सोशल मीडिया की भी अपनी भूमिका है। सोशल मीडिया का असर घरों में तेजी से फैल रहा है। इसके दुष्प्रभाव भी कम नहीं है। सोशल मीडिया पर हर तरह की सामग्री होने के चलते अभिभावकों को जरूरत है कि वे बच्चों पर निगरानी भी रखे। उनका फ्रेंड सर्कल यानि दोस्तों की संगत कैसी हैं, अभिभावकों के लिए ये जानना भी जरूरी है। सुविधाएं देने के साथ ही उनसे तकनीकी के दुरुपयोग से दूर रहने का भी संकल्प लिया जाए। बच्चों को भी चाहिए कि वे अपना आत्म सम्मान बनाएं। पहले संयुक्त परिवारों में दादा-दादी होने से बच्चों को समाजीकरण में मदद मिलती थी, लेकिन अब परिवारों में उन्हें थर्ड पर्सन माना जाने लगा है जोकि उचित नहीं हैं।