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पीजीआई में हॉस्टल की छात्राओं को आग से खतरा
पीजीआईके अग्निशमन यंत्र आग पर काबू पाने में असमर्थ हैं। अगर यहां आगजनी की कोई घटना होती है तो उस स्थिति में क्या होगा? इसका जवाब प्रबंधन के पास नहीं है। गर्ल्स हॉस्टल में लगे अग्निशमन यंत्र केवल दिखावे के लिए हैं। इन सिलेंडरों की एक्सपायरी डेट निकल चुकी है। गर्ल्स हॉस्टल के अलावा निदेशक कार्यालय, आपातकालीन विभाग, एमएस ऑफिस, लेबर वार्ड आदि विभिन्न ऐसे स्थान हैं जहां लगे अग्निशमन यंत्रों की हालत खराब है। कई उपकरण की ऊपरी सतह में लगी कैप जाम हो चुकी है। इसके अलावा सभी तरह के मसलन कपड़े, कोयला, कागजों के कार्यालय और इलेक्ट्रिकल आइटम जैसी जगहों के लिए लगभग अलग-अलग तरह के लिक्विड सिलेंडर में भरे जाते हैं। इन सिलेंडर में इसकी जानकारी भी नहीं हैं कि कौन से सिलेंडर का उपयोग किस तरह की आग को बुझाने में किया जाता है।
2जनवरी को हुए एक्सपायर
पीजीआईके गर्ल्स हॉस्टल में लगे अग्निशमन यंत्रों की रीफिलिंग तीन जनवरी 2014 को की गई थी। चूंकि रीफिलिंग की अवधि महज एक वर्ष होती है। इसलिए ये यंत्र दो जनवरी 2015 को ही एक्सपायर हो चुके हैं। इन सिलेंडरों पर बकायदा एक्सपायरी डेट भी लिखी हुई है। बावजूद इसके अभी तक प्रबंधन ने इन सिलेंडरों की रीफिल कराना मुनासिफ नहीं समझा।
रीफिलिंगडेट भी नहीं
पीजीआईकी प्रत्येक इमारत में अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं, लेकिन रख-रखाव के अभाव में इन सिलेंडरों की उपस्थिति भी विकलांग साबित होती है। अस्पताल के विभिन्न वार्डों में लगाए गए अग्निशमन यंत्रों में से कई पर रीफिलिंग डेट तक नहीं है। वहीं, कुछ में एमएफजी डेट और सीरियल नंबर भी नहीं है। सीरियल नंबर से ही इस बात का पता लगाया जा सकता है कि यह किस कंपनी का है। निदेशक कार्यालय की इमारत में दिनभर कार्यालय के फर्श, रेलिंग और दीवारों को चमकाया जाता है लेकिन कभी फायर उपकरणों की धूल साफ नहीं की जाती है।
बगैरपाइप के सूने पड़े बॉक्स
हॉस्टलमें आग से बचाव के लिए अरेंजमेंट तो हैं, लेकिन इनका हाल बेहाल है। आग लगने की सूरत में फायर ब्रिगेड की गाड़ी अगर यहां पहुंचे, तो गाड़ी से बिल्डिंग तक पानी पहुंचाने में काफी दिक्कतें हो सकती हैं। यहां पाइप के लिए लगाए बॉक्स में पाइप ही नहीं है। इन बॉक्स में डंडियां लगाई गई हैं , लेकिन पाइप कहीं नजर नहीं आता। वहीं, जितने भी फायर एक्सटिंग्युशर यहां पर रखे हैं, उन पर इनकी जांच करने या रीफिल करने की डेट भी नहीं है। इक्का-दुक्का पर अगर डेट है भी, तो उनकी डेट निकल चुकी है।
नॉलेज
उपकरणमें ये जरूरी
ईयरऑफ मैन्युफेक्चरिंग, आईएसआई मार्क, टाइप ऑफ फायर, इंस्पेक्शन टैग, हाफ ईयरली या ईयरली सर्विसिंग, एसेसरीज कम्पलीट, रेगुलर लॉग मैंटेन, ऑपरेट कैसे करना आदि तमाम जानकारियां फायर सिलेंडर पर अंकित होना जरूरी हैं, जो पीजीआई के शायद ही किसी सिलेंडर पर लिखी हो।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
अग्निशमनविभाग के पूर्व अधिकारी चंद्रकांत शर्मा का कहना है कि प्रतिवर्ष लाखों नए सिलेंडर बनाए जाते हैं। फायर उपकरण उसी तरह काम आते हैं जिस तरह घर में रखा फर्स्ट-एड बॉक्स। यह हर संस्थान में जरूरी हैं। इनकी एक साल की वारंटी होती है। एक साल बाद इनके केमिकल (कंटेंट) चेंज होते हैं और तीन साल में हाइड्रोलिक प्रेशर टेस्टिंग होती है, जो अधिकांश जगहों पर नहीं होती। इससे सिलेंडर की सही स्थिति मालूम की जा सकती है। जिनके पास लाइसेंस होते हैं, वे ही यह टेस्टिंग कर सकते हैं।
रोहतक. पीजीआईके एमबीबीएस हॉस्टल में लटके एक्सपायर अग्निशम यंत्र।
क्या कहते हैं नियम
अग्निशमनविभाग के अनुसार सिलेंडर रीफिलिंग करने के अलग से नियम हैं। यदि सिलेंडर से 10 प्रतिशत गैस भी खत्म हो जाती है तो उसकी रीफिलिंग करना जरूरी हो जाता है। ऐसा नहीं करने की सूरत में दोबारा जब भी इसका उपयोग करना होगा, ये उपकरण या तो आग पर काबू नहीं पा सकेंगे या फिर चालू ही नहीं होंगे।
रोज होती है जांच
^अस्पतालमें सिलेंडर की जांच रोज करते हैं। शायद ही कोई सिलेंडर होगा, जिसकी एक्सपायरी डेट निकल गई हो। यदि ऐसा है तो जल्द ही उसका सुधार कर लिया जाएगा। -बादामसिंह, सुरक्षा अधिकारी