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हे भगवान, सदबुद्धि दे!

7 वर्ष पहले
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रोहतक मेंमानवता कराह रही है और व्यवस्था ने कान बंद कर लिए हैं। पीजीआई में रेजिडेंट डॉक्टर छह दिन से हड़ताल पर अड़े हैं और इलाज के अभाव में 13 लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। वे लोग, जो दूर-दूर से जिंदगी की आस लेकर यहां आते हैं। इनको पता ही नहीं कि मानवता के मसीहा अभी अपने लिए ही कुछ मांग रहे हैं। मौतों से उन्हें फिलहाल मतलब नहीं। हर दिन मौत की बढ़ती गिनती उन्हें नहीं हिलाती। किसी के घर उजड़ गए होंगे, पर इनकी संवेदनाओं का संसार नहीं हिलता, जब तक कि मुख्य आरोपी को पकड़ नहीं लिया जाता। मुख्य आरोपी को पकड़ने में शायद देर होती गर चुनाव का दौर होता। यह शायद डॉक्टर भी जानते होंगे। वे यह भी जानते होंगे कि यह वक्त होता तो सरकार उनसे कठोरता से निपट सकती थी। कई राज्यों में एस्मा जैसे कानूनों के जरिए ऐसे हालात से निपटा जा चुका है, लेकिन उन्हें पता है कि मांगों को मनवाने का सही वक्त यही हो सकता है। पर क्या यह सोचने का समय नहीं है कि व्यवस्था के खिलाफ दिखाया जा रहा यह निर्मम व्यवहार आम आदमी के मन में उनकी कितनी निर्मम छवि बना रहा है। कई पेशों के प्रति समाज में बढ़ रहा असम्मान अपने ग्राहक या लाभार्थी के प्रति दिखाए जाने वाले इसी तरह के रवैये का नतीजा है। हर एक के जीवन में कोई कोई क्षण एेसा आया होगा जब हम डॉक्टर से संतुष्ट नहीं हुए होंगे, पर ज्यादातर लोग इसके लिए पूरी चिकित्सक कौम को ही जिम्मेदार नहीं ठहराते। जिसका हमारे ऊपर उपकार होता है, उसे देवदूत मानते हैं। डॉक्टरों को फ़रिश्ता कहने वाला आम आदमी पूछ सकता है कि कुछ लोगों की हरकत के लिए निर्दोष व्यक्ति से जान की कीमत क्यों वसूली जाए। यह तो इंसानियत का खून है। क्या मौत को रोकने की खातिर आंदोलन का कोई दूसरा तरीका नहीं हो सकता था? क्या जिंदगी बचाने के लिए अस्पताल की रोजमर्रा से अलग कोई इंतजाम नहीं किया जा सकता था? यदि ऐसा होता तो लोगों की सहानुभूति साथ जुड़ती। और यह माना जाता कि चंद समाजविरोधी लोगों की करतूत के खिलाफ समझदारों की जमात ने समझदार फ़ैसला किया है। डॉक्टरों की यह पीड़ा वाजिब है कि बार-बार उन्हें अपमानित होना पड़ता है। कोई भी उनसे बदसलूकी कर जाता है। अब कुलपति का यह कहना कोई मायने नहीं रखता कि मरीजों की परेशानी के लिए वे नैतिक रूप से जिम्मेदार हैं। यह नैतिक जिम्मेदारी मरने वालों को जिंदा नहीं कर सकती। क्या वे मौतों की जिम