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मजहब नहीं, कला के लिए जीता है कलाकार

7 वर्ष पहले
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सच्चाकलाकार आजाद ख्याल का होता है। वह मजहब नहीं, कला के लिए जीता है। कला में ही उसके प्राण बसते हैं। मुसलमान होकर भी 14 साल की उम्र से मैं रामलीला के विभिन्न पात्राें में जीने का सुख दुनिया में बांटना चाहता हूं। यही मेरी जिंदगी का मकसद है, जिसमें काफी हद तक कामयाब भी हूं। लोगों का इतना प्यार मिला है कि अब मोहम्मद रहीस से अब ऋषि पंडित के नाम से पुकारा जाता है। यह कहना है कार्तिकेय कलामंच मुरादाबाद के असिस्टेंट डायरेक्टर मोहम्मद रहीस का। शुक्रवार को वे दैनिक भास्कर से रूबरू हुए। आईटीआई ग्राउंड पर श्रीरामलीला उत्सव कमेटी द्वारा आयोजित रामलीला में बतौर सह निर्देशक रहीस ग्रेजुएशन कर रहे हैं। 8 वर्ष की उम्र में थियेटर से उनका रिश्ता ऐसा जुड़ा कि आज अभिनय ही उनकी मंजिल बन गया है। चौदह साल की उम्र में देहरादून में देेखी रामलीला को अपना सौभाग्य बताते हैं। वहां से लौटे तो सीधे डॉ.पंकज दर्पण अग्रवाल से मुलाकात की, जो कार्तिकेय कला मंच के संस्थापक हैं। उनकी लगन-मेहनत ने अभिनय के साथ ही डायरेक्टर तक ओहदा प्रदान कर दिया।

धर्मके चश्मे से रामलीला को देखें

रामलीलामें हर पात्र की भूमिका निभाने में माहिर रहीस श्रीराम के चरित्र को समाज के लिए आदर्श मानते हैं। उनकी नजर में राम भारत के ही नहीं दुनिया भर के हीरो हैं। रामलीला को धर्म के चश्मे से देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। रामलीला बेहतर जीवन का सबक है, जिसकी बदौलत नई पीढ़ी के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। साथ ही ऐसे समाज का निर्माण किया जा सकता है, जहां पर लोगों के बीच मजहब नहीं इंसानियत का नाता हो।